जीवन परिचय

संन्यासी स्वामी बिजुली नन्द सरस्वती (भोजपुरी)

संन्यासी स्वामी बिजुली नन्द सरस्वती (भोजपुरी) 

पौत्रिक नाम राम भवन बिजुली प्रसाद, जन्म 10 मार्च सन् 1952 ई० ग्राम- मझवलिया, डाकघर- गौरी, तहसिल सलेमपुर, जिला आज स्वामी जी महाराज के नाम से जाना जाता हैं। देवरिया, उत्तर प्रदेश, भारत वर्ष। इन्हे संन्यासी स्वामी बिजुली नन्द सरस्वती 

अनुक्रम 

१ प्रारम्भिक जीवन 

२ विद्यार्थी जीवन 

३ व्यवसायिक जीवन 

४ संन्यासी जीवन 

५ उद्देश्य 

६ किताबें 

७ सन्दर्भ

1. प्रारम्भिक जीवन 

10 मार्च 1952 ई० नाले से तीन तरफ घिरा हुआ ग्राम मझवलिया, डाकघर- गौरी, तहसिल-विकास खण्ड- सलेमपुर, जिला देवरिया, पुर्वी उत्तर प्रदेश के एक मध्यवर्गिय हिन्दू परिवार में इनका जन्म हुआ था। इनके माताश्री का नाम स्व० श्रीमती रजिया देवी तथा पिता श्री का नाम स्व० श्रीमान बिजुली प्रसाद जो गांव के हि एक जमीदार के यहां मैनेजर एवं कार्यकर्ता थे उस जमीदार के घर एक मात्र श्रीमती परमजोतिया देबी (बबुआबो) के नाम की एक निसंतान बृद्ध विधवा महिला थी जिसने स्वामीजी महराज का अपने पुत्र जैसे पालन पोषण किया था। स्वामीजी के पिता श्री राजसी जीवन में महान विचारक और एक उच्च दार्शनिक व्यक्ति थे उन्हि के प्रश्न की पूर्ति संन्यासी स्वामी बिजुली नन्द सरस्वती का मस्तिष्क अन्वेषण है। स्वामी जी महाराज ने सन् 1966 ई० में काशी बनारस के अस्सी घाट पर संन्यास की दीक्षा लिया और इनके गुरु जी ने इनका नाम रामभवन बिजुली प्रसाद की जगह संन्यासी स्वामी बिजुलिनन्द सरस्वती रख दिया था।

2. विद्यार्थी जीवन

छः वर्ष की आयु में इनके गांव के पूरब एक किलो मीटर दूर ग्राम श्रीनगर में इनके शिक्षा का प्रारम्भ हुआ था, शिक्षा का इनके जीवन पर कोई प्रभाव नही पड़ा, इनको केवल हिन्दी भाषा का पढ़ना लिखना नाम मात्र आता है पर अपने पिता श्री के दार्शनिक विचार धारा में प्रवाहित होकर बचपन से ये धर्मिक रहस्यों को जानने में उत्सुक रहते थे। सन् 1966 ई० में इनका जीवन वैवाहिक हो गया और सन् 1970 ई० में ये पिताश्री बन गये थे। हाईस्कुल की परिक्षा सन् 1966 ई० में देने के बाद इनका मन पढ़ने में नहीं लगा और ये अपने एक सहयोगी के पास कश्मीर में खन्नावाल चले गये तथा अपने सहयोगी के माध्यम से जिला अनन्तनाग में २ सी० आर० पी० में एक सिपाही के रुप में भरती हुए और इनको ट्रेनिंग के लिए निमच मध्य प्रदेश भेज दिया गया।

3. व्यवसायिक जीवन

सन् 1971 ई० में सी० आर० पी० की ट्रेनिंग समाप्त होने के बाद ये पुनः अपने बटालियन अनन्त नाग कश्मीर में आ गये तथा अपने डियूटी के दौरान अनन्त नाग के कुछ गाँवो में गये और देखे की वहां के निवासियों में अन्यन्त सरल साधारण समाजिकता थी जो सायद सनातन काल की व्यवस्था जैसी है। इससे ये बहुत प्रभावित हुये। एक वर्ष बाद इनकी कम्पनी कश्मीर बृजविहारा गाँव के रेशम की एक फैक्ट्री में आ गई यहीं पर रहते समय बंगला देश की आजादी एवं पाकिस्तान से युद्ध हुआ था कुछ महिने बाद इनकी कम्पनी को राजधानी श्रीनगर के नये सचिवालय में भेज दिया गया। दर्शन के लिए एक दिन ये शंकराचार्या पहाड़ी के मन्दिर गये और वहा शिवलिंग दर्शन के बाद एक चमक को अपने आँखों में प्रवेश करते हुए महसूस किया इसी प्राकृतिक दुर्लभ घटना ने इनके जीवन को अध्यात्मिक चिन्तन में आकर्शित कर दिया। चुकि किसी भी फोर्स के व्यक्ति का जीवन प्रतिवंधित होता है स्वतंत्र नही होता इसलिए इनको अपने स्वतंत्र प्राकृतिक चिंतन में रुकावट पैदा होने लगी और ए अपने स्वतंत्र चिंतन के लिए सी०आर०पी० की नौकरी त्याग कर अपने जन्म भूमि वापस आ गये तथा पल-पल के चिन्तन में प्राकृतिक जीवन क्रिया की खोज करने लगे कुछ वर्ष घर रहने के वाद अपने आर्थिक मजबुरियों में आकर नौकरी की तलास में पुनः हरियाणा जमुना नगर गये तथा सरस्वती सुगर मिल के वर्क साप में एक वर्ष तक मकैनिकल फीटर का कार्य एवं फेब्रिकेटर आदि कार्यो को सीख कर नौकरी की तलास में मुम्बई चले गये। मुम्बई में अंधेरी पूरब एम० आई० डी० सी० में इलेक्ट्रो न्युमैटिक एंड हाइड्रोलिक इण्डिया प्राईवेट लिमिटेड में इन्हे फीटर की तरह नौकरी पर रख लिया गया। आठ वर्ष में यहाँ इनका अर्थिक हालत सुधर गया था पर सन् 1992-93 में बाबरी मस्जिद गिरने के बाद मुम्बई में हिन्दू-मुसलिम के बीच जो भयंकर विवाद इनके नजरों के सामने गुजरा वहीं इन्हे संन्यास लेने को मजबूर किया था क्योंकि इनके अन्दर इस धार्मिक विवाद को देख कर एक आवाज आयी थी कि धर्म-मजहब की उत्पति को अगर ज्ञात कर लिया जाय तो सभी धर्म-मजहब के विवाद को समाप्त किया जा सकता है। इसी के लिए इन्होने अपनी अच्छी खासी नौकरी परित्याग कर दिया जब कि कम्पनी के डाईरेक्टर ने इनको अपने नये कम्पनी का वर्कसाप फोरमैन बना कर चाखन-पुना भेज रहा था जहां पर आज प्रतिमाह पचास हजार रुपयों से उपर की सैलरी है पर धर्म-मजहब से दुःखी दिल ने इन्हे नौकरी परित्याग करने को मजबूर कर दिया और ये नौकरी छोड़कर अपने जन्मभूमि आ गये। कुछ दिनो बाद इनके श्रीमती जी का निधन हो गया और ये एक वर्ष तक एकान्त वास करने के बाद अपने तीन नाबालिक बच्चों प्रमोद कुमार 16 वर्ष, ममिता कुमारी 13 वर्ष, अमोद कुमार 11 वर्ष को अपने बड़ा लड़का बिनोद कुमार जो 28 वर्ष का बालिग था के हवाले कर सन् 1966 ई० में सत्य ईमान की तलास के लिए संन्यास ले लिया बारह वर्ष तक सभी धर्मों के अध्ययन करने के बाद इन्हे अपने प्राकृतिक जीवन ज्ञान में यह मालूम हुआ कि मानव मस्तिष्क के क्रिया का अन्वेषण कर सनातन धर्म का अविष्कार हुआ था तथा सनातन धर्म से सभी धर्मों का अविष्कार हुआ है।

4. संन्यास जीवन

संन्यासी स्वामी बिजली नन्द सरस्वती का संन्यास जीवन काशी-वनारस अस्सी घाट से प्रारम्भ हुआ है, दो वर्ष अस्सी घाट पर रहकर इन्होने संगीत की दीक्षा लिया तथा सन् 2001 में इलाहाबाद त्रिवेणी बाँध पर आ गये कुछ महिने के बाद आपने यहां से प्रस्थान कर दिया और राजस्थान जयपुर में गलता गेट के पास अमरेश्वर शिव मन्दिर जो जंगल में है पर रहने लगे, यहीं पर एक वर्ष रहकर आपने मस्तिष्क व्यायाम द्वारा अपने मस्तिष्क का अन्वेषण किया जो भगवान शंकर के मस्तिष्क अन्वेषण के तत्व ज्ञान की व्याख्या सामवेद का पूरक है और आप यहां से गोवर्धन उत्तर प्रदेश चले गये कुछ वर्ष गोवर्धन में रहने के बाद नई दिल्ली कमला मार्केट में हरिहर उदासीन आश्रम आ गये यहां पर भी कुछ वर्ष रहने के बाद आप दिल्ली कराला-मजरी गांव के विरक्त कुटी पर रहने चले गये यहां भिक्षा भोजन का बहुत बड़ा महत्व है यहां लगभग एक वर्ष भिक्षा करने के बाद आप पुनः हरिहर आश्रम कमला मार्केट नई दिल्ली चले आये हरिहर आश्रम में रहने वाले संत को कहीं शहर में आने-जाने पर शक्त प्रतिवंध है इसलिए इन्हें 3अपने रिसर्च की टाईपिंग कराने एवं अपने स्वतंत्र विचार को उतारने के लिए मजबूर होकर लखनऊ जाना पड़ा।  लखनऊ में चार बाग स्टेशन के बिपरीत तरफ आलम बाग के साथ रेलवे पावर हाउस चौराहा पर हनुमान मंदिर है जहां पर आप रह कर अपने बारह बरस के अन्वेषण का कम्प्यूटर टाईप कराया तथा एक हिन्दी विशेषज्ञ से इसकी शाब्दिक त्रुटि जांच कराकर रिसर्च बुक आदि शक्ति पुराण के रुप में तैयार किया है।

5. इनके विचार एवं उद्देश्य

इनके अन्वेषण के अनुकूल प्राकृतिक प्राणी मानव का मस्तिष्क आदिकाल की एक मौसम दुर्घटना द्वारा तरंगत दुर्गुण पैदा होने से मजबूर होकर आक्सीजन ले रहा है इसी से मस्तिष्क में भौतिक इच्छा शक्ति का जन्म हुआ है जिससे मस्तिष्क में दूषित आशक्ति पैदा होकर मनुष्य को प्राकृतिक जीवन क्रिया के उद्देश्य से अलग कर दिया है और अपने प्राकृतिक प्राणी के जीवन उद्देश्य को पुनः प्राप्त करने के लिये मनुष्य धर्म-मजहब, राजनीति, विज्ञान आदि का आविश्कार कर दिनप्रतिदिन अपने जीवन उद्देश्य से दूर होता प्रयोग जा रहा है, अगर मानव को उसके प्राकृतिक प्राणी के जीवन उद्देश्य में पुनः स्थापित कर दिया जाये तो मनुष्य की सभी समस्या अपने आप समाप्त हो जायेगी इसके लिये आज की मानसिकता के अनुकूल वैज्ञानिक सिद्धांत से इनके अन्वेषण के प्रयोग को सार्वजनिक तरह से प्रमाणित कर विश्व को इससे अवगत कराना होगा और इनके अन्वेषण उपलब्धि के मस्तिष्क व्यायाम द्वारा २५ वर्ष से कम आयु के लड़के-लड़कीयों को मस्तिष्क व्यायाम कराकर प्राकृतिक गुण की मस्तिष्क क्रिया में प्रमाणित करते हुवे अर्थात् मस्तिष्क को प्रयोग द्वारा आक्सीजन लेने की क्रिया समाप्त कराते हुवे प्रशिक्षित कर भिक्षु बनाना होगा और सरकार के सभी निर्णायक पद-पोस्टों पर एक-एक भिक्षु स्थापित किया जायेगा तथा एक हजार आदमी पर एक प्रयोगशाला के साथ एक भिक्षु स्थापित कराकर सम्पूर्ण मानव जगत को आशक्ति रहित बनाना होगा। (ध्यान दें- यह व्यवस्था सनातन काल में स्थापित थी जिसे सतयुग कहा जाता है) मात्र पांच वर्ष में सम्पूर्ण मानव जगत भगवान कृष्ण, प्रभु ईश, महात्माबुद्ध, महाबीर स्वामी, हजरत मुहम्मद, महात्मा कबीर, गुरुनानक देव आदि के मस्तिष्क क्रिया के गुण में अपने आप परिवर्तित हो जायेगा इससे प्राकृतिक प्राणी मानव के जीवन का उद्देश्य पूरा हो जाता है, अर्थात प्रयोगशाला द्वारा मानव मस्तिष्क में आदिशक्ति नाम की निस्क्रिय पड़ी चैतन्यता की तरंग जागृत हो मानव के शरीर में सक्रिय हो जाती है इससे मनुष्य आलश्य रहित चैतन्य हो जाता है ऐसे मनुष्य के मस्तिष्क में आशक्ति नहीं रहती है और आशक्ति मस्तिष्क से समाप्त होने पर मनुष्य किसी प्रकार का अपराध नही कर सकता है यह धर्म शास्त्र में भी वर्णित है। इस चैतन्यता की इलेक्ट्रिक तरंग द्वारा सभी प्रकार की बीमारियां भी अपने आप जलकर समाप्त होती जाती हैं इसको ये स्वयम् प्रयोग कर प्रमाणित किये हैं इसी को धार्मिक भाषा में स्वर्ग-जन्नत के आनन्द का जीवन कहा जाता है। इसके बाद मनुष्य को कुछ और प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता है, अर्थात इस प्रयोग व्यवस्था द्वारा उग्रवाद, परमाणु बम, एड्स, कैंसर, बलत्कार, आदि सभी प्रकार की जटिल से जटिल बुराईयां एवं बीमारियां समाप्त होंगी तथा धर्म-मजहब, राजनीति, विज्ञान आदि भी अन्धविश्वास माना जायेगा और मजबूर होकर सम्पूर्ण विश्व एक राष्ट्र होने लगेगा। 

अतः इस अनवेषण की व्यवस्था को इसी संविधान एवं कानून से ऊपर स्थापित कर विनाष होने के कागार पर पहुँचे मनुष्य जीवन का उद्धार हो हाना सम्भव है अन्य कोई विकल्प नही है। 

किताबें-

मानव मस्तिष्क का रिसर्च बुक ” आदि शक्ति पुराण” प्रकाशित 

संदर्भ-

भिक्षा भोजन की उपासना (संन्यासी) एवं प्राकृतिक जीवन ज्ञान विकाश संगठन संस्थापक (अध्यक्ष) 

संन्यासी स्वामी बिजुलिनन्द सरस्वती. सन् 2011 रामभवन बिजुलि प्रसाद सन् 1966 

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