ईमान का वैज्ञानिक रहस्य: खुदा की सच्ची इबादत

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ईमान का वैज्ञानिक रहस्य: खुदा की सच्ची इबादत

 
यह आपके और आपके बच्चों का जीवन है इसलिए इसे लाइक और शेयर अवश्य करें समाज की भलाई के लिए REAL TRUTH OF LIFE & SCIENTIFIC THEORY OF ईमान का पैगाम खुदा की फौज उग्रवादियों के नाम हमने कुराआन पाक पढकर उसके उद्देश्य को समझा बाबा आदम या सनातन जैसे इस्लाम का उद्देश्य भी मानव की मस्तिष्क क्रिया को खुदा-परमेश्वर के अनुकूल क्रियान्वित करने पर आधारित है ।और यही ईमान है तथा इसी ईमान को कायम करने के लिए उग्रवाद (जेहाद) चलाया जा रहा है ।
 
अतः हिन्दू धर्म में राम-रावण की लडाई तथा महाभारत धर्म युद्ध के नाम से जाना जाता है इसी तरह ईमान कायम करने के लिए यह इस्लामी जेहाद खुदा परस्ती का एक धर्म युद्ध है पर यह किसी गोला-बारूद से कायम नहीं होगा चाहें कोई अमेरिका-रूस के सभी हथियार लेकर उग्रवाद चलाए।ईमान कायम केवल एक ही शर्त पर होगा जब कोई व्यक्ति इबादत द्वारा मुसल्लम ईमान बनकर खुदा से आज की मानसिकता के अनुकूल ईमान का रहस्य उतारे और वे सभी रहस्य आज हमारे पास हैं।हमारे अन्वेषण के अनुकूल ईमान कायम करने का मतलब मुसलमान बनना नहीं है बल्कि मुसल्लम ईमान-पूर्ण सत्य बनना है। क्योंकि मुसल्लम ईमान की जीवन क्रिया बुराई एवं बीमारी मुक्त होती है जबकि आज मुसलमान कहे जाने वाले व्यक्ति बुराई एवं बीमारी से मुक्त नहीं हैं।
अतः ईमान खुदा-परमेश्वर से प्राप्त मानव की प्राकृतिक जीवन क्रिया का नाम है जिसका पाक प्रोग्राम सभी मानवों के मस्तिष्क में रिकॉर्ड है जिसे नमाज़, योग, मस्तिष्क व्यायाम द्वारा वर्तमान भौतिक मस्तिष्क क्रिया को समाप्त कर अपनी प्राकृतिक मस्तिष्क क्रिया को पुनः क्रियान्वित करने से मानव मस्तिष्क से अपने-आप ईमान- सत्य की जीवन क्रिया प्राप्त होने लगती है ।ऐसी क्रिया में स्थापित व्यक्ति मुसल्लम ईमान होता है तथा पाक नियत या ब्रह्म या प्राकृतिक इच्छा शक्ति में खुद-परमेश्वर द्वारा प्राकृतिक जीवन क्रिया का रहस्य प्राप्त होने को ही उतारना कहते हैं ।
इसमें अत्यन्त दुर्लभ रहस्य यह है कि मांसाहारी व्यक्ति में उतारने की क्रिया क्षणिक होती है पर शाकाहारी व्यक्ति में यह क्रिया सर्वदा होती रहती है ।
 
अतः इसी क्रिया द्वारा मैंने खुदा की इबादत से मुसल्लम ईमान बनकर आज की वैज्ञानिक मानसिकता के अनुकूल अर्थात अंधविश्वास रहित ईमान उतारा है यह एक वैज्ञानिक सिद्धान्त पर आधारित दो समय की नमाज़ है जिसके द्वारा आधुनिक यंत्रों से प्रमाणित कर मानव मस्तिष्क में ईमान नाम की इलेक्ट्रॉनिक तरंग जैसी शक्ति मात्र 21दिन में क्रियान्वित होती है जो मस्तिष्क में पीछे स्थित खुदा के नूर या आदि-शक्ति की इलेक्ट्रिक तरंग से पैदा होती है इसको हमारी रिसर्च बुक*ईमान की तलाश से भी ज्ञात किया जा सकता है।
 
जिसके शरीर में प्रवाहित होते ही जीवन में सभी प्रकार की जटिल से जटिल बीमारियाँ जादू-म॔त्र जैसे लुप्त होने लगती हैं तथा शरीर बुराई एवं बैक्टीरियल प्रूफ होकर जन्नत का आनन्द प्राप्त करने लगता है ऐसा ही जीवन सभी प्राणियों का है और ईमान की इलेक्ट्रॉनिक तरंग में शब्द के रूप में नहीं छाया के साथ आदेश के रूप में मानव अपने प्रशन का उत्तर खुदा नाम की शक्ति से प्राप्त करता रहता है।इसके द्वारा ही वेद-कुरआन उतारा गया था तथा खुदा के नूर की तरंग से मजदूर होकर आकाश में स्थित खुदा-परमेश्वर की इलेक्ट्रॉनिक तरंग भी जमीन पर उतर आती है ।
 
आभी हमारी प्रयोगशाला में वह अपने-आप उतरती रहेगी यह कयामत का जैसी भी हो सकती है इसे ही भगवान शंकर ने काशी में उतारा तथा पैगम्बर लोगों ने कोहीतेर पर्वत पर प्राप्त किया था अभी यह शक्ति एक तूफ़ान के रूप में सदैव हमारे साथ रहेगी कोई भी इसे देख सकता है
 
अर्थात में जहाँ भी जाऊँगा वहां यह अपने आप उतरेगी इससे विश्व के सभी प्रेत-आत्माओं का मोक्ष हो जायेगा ।अतः ये सभी प्रमाण संसार के सामने आते ही पूरा विशव अपने-आप ईमान कबूल कर लेगा उग्रवादियों को जेहाद चलाने की जरूरत आब नहीं है ।
 
चेतावनी :- ईमान कायम करने का जो प्रमाण मैंने प्रस्तुत किया है वैसा प्रमाण आज तक किसी मानव इतिहास में पैगम्बर या भगवान ने मानव को नहीं दिया है इसलिए हमरी प्रयोगशाला से पहले अगर कोई उग्रवादी जेहाद चलायेगा तो गैर इन्सानियत होगा ।
 
ध्यान दे : – विश्व के सभी मानव अपनी जीवन क्रिया में पल-पल में सुख, शान्ति, आनन्द, परमानंद की तलाश कर रहे हैं पर उनहें यह कैसे प्राप्त होगा किसी को मालूम नहीं है इसलिए भौतिकता का सहारा लेना सभी मनुष्यों की मजबूरी है ।अभी प्राकृतिक सुख, शान्ति, आनन्द, परमानंद वैज्ञानिक सिद्धान्त पर प्रमाणित होते ही पूरा विशव अपने धर्म-मजहब को त्याग कर अपने-आप ईमान की जीवन क्रिया में समर्पित हो जायेगा ।
अतः इसी अज्ञानता के कारण महात्मा मुहम्मद साहब अनेक तरह के कष्ट सहते हुए 23 वर्ष बाद अपने ईमान के रहस्य को पेश करने में कामयाब हुए थे।उसी तरह हमें 34 वर्ष ईमान का रहस्य को तलाश करने में व्यतीत हुए हैं
 
जबकि आज इस्लाम को छोड़कर विश्व का कोई भी व्यक्ति ईमान-सत्य के महत्व को समझने योग्य नहीं है इसलिए ईमान की घोषणा शब्द में करना उचित नहीं है बल्कि आज की वैज्ञानिक मानसिकता के अनुकूल प्रयोगशाला विधि जैसे इसका प्रयोग प्रमाण प्रस्तुत करना होगा तो यह घोषणा अपने आप हो जायेगी ।

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