हमारी खोज के अनुकूल प्रेम मस्तिष्क न॔ एक को दुर्बल करने के लिए प्रयोग किया जाता है पर प्रेम क्रिया को वैज्ञानिक दृष्टि से देखने पर ज्ञात हुआ है कि अपने प्राकृतिक कर्तव्य से बढं कर मनुष्य जिस वस्तु ,प्राणी, प्रेमिका इत्यादि के साथ अपना-पन प्रगट करता है उसी को सामाजिक भाषा में प्रेम कहा जाता है ।
जैसे अपने बेटे या परिवार के प्रेम में बिभोर होकर मनुष्य उनकी गलतियों को नजरअंदाज करता रहता है।जिससे वह परिवार या बेटा बडा होने पर गलतियों को करने में निडर हो जाता है और यह प्रेम क्रिया ही अपराध का रूप ले लेती है इसी तरह मनुष्य किसी वस्तु से प्रेम करता है तो उस वस्तु के कुछ क्षति हो जाए या वह वस्तु गुम हो जाये तो मनुष्य घनघोर दुख का अनुभव करता है यह उधाहरण यह सिद्ध करता है कि घनघोर दुख पैदा करने का जड ही प्रेम है।
इतिहास में तो यह भी पाया गया है कि हिरण के बच्चे से प्रेम करने वाले केई ॠषि एव बच्चे हिरण के मृत्यु के बाद खुद मर गये हैं और नरक योंनि प्राप्त किये इसी तरह आज के आधुनिक युग में प्रेम ही जीवन बनता जा रहा है आज भारत के सभी शहर गाँव में प्रेम खुली किताबोंजैसे दिखाई दे रहा है मैंने इसको अत्यंत करीब से देखा तो यह ज्ञात हुआ कि विश्व में जितना भी अपराध है उसमें से 50% केवल प्रेम प्रकरण के कारण ही हो रहा है ।
फिर में प्रेमी-प्रेमकाओं को अपने तत्वज्ञान गुण में जाकर देखा तो पाया कि नयी पीढ़ी के लोगों में पुरुषार्थ ( वीर्य की प्राकृतिक शक्ति ) बहुत ही कम हो चुकी है इसकी कमी को छुपाने के लिए प्रेमी-प्रेमका नहीं बनने से हर नोजवान अपने को अधूरा मानता जा रहा है अतः पूर्वजों में परदे का रिवाज हमारे इस लेख का अकाट्य सत्य उधाहरण है
आज से मात्र 50 वर्ष पूर्व में नर के नजर में वह पुरुषार्थ था जब नर किसी नारी को अपने खुले आखों से देख लें तो नारी उसके संभोग क्रिया के लिए मजबूर हो जाती थी इससे बचने के लिए ही पूर्वज लोगों ने पर्दे का रिवाज बनाया था ।
अतः आज जो फिल्म या उपन्यास या गीत प्रकाषित हो रहें हैं वह खुले संभोग के प्रदर्शन से भरा हुआ है आज की फिल्मों में खुले तरह से लडका-लडकी चुम्बन करते हैं नीचे-ऊपर होकर संभोगिक क्रिया का प्रदर्शन करते हैं एक दूसरे को सीने से पकड़ लेते हैं पर दर्शकों में इससे उत्तेजना नहीं सक्रिय होती है पर यही व्यक्ति 50 वर्ष पूर्व के पिक्चर को देखें तो ज्ञात होगा कि हीरो -हीरोइन को अगर खुली नजर से देख लेता या किसी असमय काल में छूना चाहता तो पिक्चर देखने वालों का वीर्य छल कते थे।और हाल में सीटी बजने लगती थी उन फिल्मों के प्रदर्शन में आज भी वही गुण है मैं इस प्रेम पर सर्वेक्षण करते हुए नई दिल्ली गया । और राष्ट्रपति भवन के आगे मैदान में जामुन के पेड़ हैं उसके नीचे पत्थर के बेंच रखें हुए हैं ।
मैं उस पर आराम से बैठ कर वहाँ के होने वाली क्रियाओं को देखने लगा थोड़ी देर में एक प्रेमियों का जोड़ा आया और मुझसे मात्र 8 या 10 फुट की दूरी पर घास पर बैठ गया वे दोनों कुछ वार्ता करने के बाद लडका उस लडकी के साथ हाथ संभोग प्रारंभ कर दिया लगभग काफी देर तक प्रक्रिया चली यें दोनों प्रेमी पुस्तकों के साथ किसी कॉलेज के छात्र-छात्रा होंगे फिर में वहां से उठकर दूसरे जगह चला गया और वहां दूसरे बेंच पर बैठ गया फिर कुछ देर बाद वहां भी 45 या 50 वर्ष के आयु का जोड़ा आया और हमारे नजदीक बैठकर हाथ संभोग क्रिया प्रारंभ कर दिया मैं एक भिखारी के रूप में वहां बैठा था ।
इसलिए मुझे वहां पर कोई षायद कोई मनुष्य नहीं मानता था । पर मेरे द्रवित हृदय ने इस गिरते हुए पुरुषार्थ को देख कर नैनो से आंसू छलक गये । क्योंकि उस समय मुझे वह लेख याद आ गया कि कलयुग के अन्दर नारी खुली वैश्यावृत्ति का उधाहरण प्रस्तुत करेगी अर्थात गिरते हुए पुरुषार्थ के कारण नारी का वैश्या होना मैं गलत नहीं मानता हूँ ।
अतः मैं अपने जीवन का सबसे बहुमूल्य समय बम्बई में व्यतीत किया हूँ ।मैंने अपने तपोबल से मस्तिष्क क्रिया को हजारों वर्ष पूर्व के वीर्य शक्ति में पहुंचायाँ और बम्बई की नारी जाति का दर्शन करना आरंभ किया उस समय की जवां नारियां अपने-आप आकर्षित होने लगी तथा हमारे पडोसी लोग आज भी जिन्दा सबूत हैं कि मैं चहाता तो अनेकों नारियों को स्वातंत्र रूप से कहीं भी लेकर जा सकता था।पर में संभोगी नहीं था और संभोग में पहुंचने से पूर्व इस आकर्षण को समाप्त कर देता था नारियां कुछ देर के लिए इस क्रिया से असंतुष्ट होती थी पर मैं नजर अंदाज कर देता था । अर्थात नर के शरीर में वीर्य-शक्ति की उत्तेजना नारी का आकर्षण है ।
अतः इस प्रेम क्रिया के गुण को मैं प्राचीन पुस्तकों में ढूंढा प्रेम का प्रयोग केवल बाइबिल को छोड़कर किसी ग्रंथ में नहीं है । कुरआन में तो प्रेम अगर अपने बेटे से हो तो बेटे को ही धीरे-धीरे काटने के लिए खुदा ने कहा है । गीत शास्त्र में कॄषण प्रेम का प्रयोग केवल अपने भक्तों के लिए एक-दो बार किये हैं। इसके अलावा कोई भी दूसरा उधाहरण प्राचीन पुस्तकों में नहीं है । मैं प्रेम के लिए अपना शब्द दुरूपयोग नहीं कर रहा हूँ । कुरआन में दियें गये कठोर प्रतिबंध का पक्षधर हूँ हमारी प्रयोगशाला विधि जब भी प्रारंभ होगी तो प्रेम प्रदर्शन करने वालों को उनके प्राकृतिक प्रेम प्रसंग में अवश्य प्रवीण कराया जाएगा ।क्योंकि अर्थ व्यवस्था के बाद इस मानव धरती का दूसरा दुश्मन प्रेम प्रदर्शन है । अर्थात प्रेम को रखकर दुश्मनी समाप्त नहीं की जा सकती है ।