अपना पथ एक आध्यात्मिक समूह है जो ध्यान, सेवा और आत्मबोध के माध्यम से लोगों को आंतरिक शांति, प्रेम और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा और दिशा प्रदान करता है।
मनुष्य अपने जीवन का उजाला सुंढते-ढुंढते घनघोर अंधेरे में आकर अपने उद्धार के लिये किसी शक्ति द्वारा एक अनहोनी होने का इन्तजार कर रहा है। आज मानव के जीवन का वह इन्तजार समाप्त हो गया क्योंकि मैं विश्व मानव समुदाय के सपनों का वह वैज्ञानिक हूँ जिसके अन्वेषण उपलब्धि द्वारा मानव जगत से सभी प्रकार की बुराईयां एवं बीमारियां समाप्त होकर सतयुग-ईमान या प्रकृतिवाद की स्थापना होगी अर्थात् आदि पूर्वज लोगों ने अनेक सदियों से युग परिवर्तन होने की जो भविष्यवाणियां की हैं वह सभी भविश्यवाणियां मुझ सम्राट के प्रगट होने के लिये की गई थीं क्योंकि हमारे द्वारा सम्पूर्ण विश्व की शासन व्यवस्था अत्यन्त सरलता पूर्वक परिवर्तित होकर सभी देशों की सिमायें समाप्त हो जायेंगी। मुझे युग परिवर्तन करने के लिये जो अन्वेषण उपलब्धि प्राप्त हुई है वह आज के मानसिकता के अनुकूल सत्य-असत्य से ऊपर वैज्ञानिक सिद्धांत पर आधारित है और बच्चों के खेल जैसे अत्यन्त सरल साधारण है, हमारे रिसर्चबुक एवं प्रयोग क्रिया द्वारा हमारा कोई एक शिष्य भी इस दूषित मस्तिष्क क्रिया के युग से मानव संसार का उद्धार कर सकता है इसपर आप अविश्वास होने का प्राश्चित न करें वल्कि इसपर आप सरलता से विश्वास प्राप्त करने के लिये आठ दिन तक हमारा संगत करें तो आपको वैज्ञानिक प्रमाणों से यह ज्ञात हो जायेगा की सभी धर्मों का आविष्कार कैसे हुआ था अर्थात् प्राकृतिक प्राणी मानव अपने धर्म के सहयोग से सामाजिक प्राणी कैसे बन गया है इसपर विश्वास होते हि आप स्वयं हमारे मिशन में समर्पित हो जायेंगे और संसार की सभी उपलब्धियां मिथ्या प्रतित होने लगेंगी।
इस अन्वेषण को पूर्ण करने में मुझे लगभग 40 वर्ष लगे है उसको 2-4 घण्टे में कोई मुझसे समझना चाहे तो यह सम्भव नहीं है आपको मैं अपना परिचय दे रहा हूँ आप चाहें तो अपने सभी दुर्लभ प्रश्नों का उत्तर जिससे जगत कल्याण होना सुनिश्चित है मुझसे किसी भी समय प्राप्त कर सकते हैं आज से आप सभी का करतब्य बनता है कि हमारे द्वारा प्राप्त रहस्यों से मानव जगत को अवगत करायें इससे विश्व शान्ति एवं एकता अपने आप स्थापित होती जायेगी पर हमारे और आपके शब्दों के आदान-प्रदान के बिच में भौतिक मस्तिष्क क्रिया एवं प्राकृतिक मस्तिष्क क्रिया की एक दिवार खड़ी है जिसे गिराना होगा और आज के धर्मात्माओं, राजनीतिज्ञों और वैज्ञानिकों के महत्व से ऊपर उठकर स्वतंत्र मस्तिष्क क्रिया द्वारा वर्तमान जीवन में होने वाली घटनाओं पर वार्ता करना होगा। जैसे आज तक जितनी भी धर्म पुस्तकें उपलब्ध है उनके सत्यता का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं पाया जाता जबकि अपने धर्मों के लेख को अन्धविश्वास गुण से सत्य सानकर मनुष्य उसके लिये मर जाने को तैयार है पर हमारे पास जो भी उपलब्धि है उन सभी के सत्यता का वैज्ञानिक प्रमाण है और यही सभी धर्मों के अन्धविश्वास का वैज्ञानिकीकरण भी है तथा यह मनुष्य के अन्तिम प्रश्न का अन्तिम उत्तर है जैसे मनुष्य का अन्तिम प्रश्न यह है कि मनुष्य अपने आप को कैसे जानेगा या अपने प्राकृतिक प्राणी के जीवन में कैसे स्थापित होगा क्योंकि मनुष्य जिस समय अपने आप को जान लेता है उसी समय वह अपने सभी प्रश्नों का उत्तर भी प्राप्त कर लेता है यह तथ्य पूर्ण सत्य है पर इसके पहले एक प्रश्न और पैदा होता है कि मनुष्य अपने आप को या अपने प्रकृतिवाद को क्यों नहीं जानता है अर्थात् किस कारण मनुष्य अपने-आप के ज्ञान से अलग हुआ है या अज्ञान हुआ है।
अतः अपने अज्ञानता को जाने वगैर अपने ज्ञान को नहीं पाया जा सकता है सभी मनुष्य यह जानते है कि हम अज्ञान है पर वे यह नहीं जानते कि वे अज्ञान क्यों हैं जिस तरह किसी बीमारी के रहस्य को जाने वगैर उसके दवा का कोई महत्व नहीं होता है उसी तरह अपने अज्ञानता को नहीं जानने के कारण हि मानव जीवन में अंधेरा उत्पन्न हुआ है धर्म मजहब के द्वारा मनुष्य खुदा, भगवान, ज्ञान पाने की चेष्टा करता है पर खुदा, भगवान, ज्ञान की प्राप्ती से मनुष्य अपने किस कमी की पूर्ति करेगा किसी भी व्यक्ति को मालुम नहीं है पर आज हमारे अन्वेषण द्वारा इस अति दुर्लभ प्रश्न या अंतिम प्रश्न का अंतिम उत्तर मानव जगत को प्राप्त होगा तो अन्नत युगों का जीवन अंधेरा अपने आप समाप्त होता जायेगा।
संसार का हर आदमी यह चाहता है कि मानव के जीवन से अपराध करने की प्रवृत्ति समाप्त हो और मनुष्य सुख शान्ति आनन्द का जीवन व्यतित करे पर दिन-प्रति-दिन अपराध का विकाश हो रहा है इसी से मानव का जीवन अशान्त होकर अनर्गल उत्तेजना में प्रवेश कर रहा है। कानून के निर्माण से पूर्व पूर्वज लोगों ने यह मान लिया है कि मनुष्य अपराध करेगा क्योंकि अपराध की रोकथाम के लिए ही कानून का निर्माण हुआ था पर दिन प्रतिदिन अपराध का विकाश होता आया है क्योंकि कानून के नजर में न आकर किसी भी कार्य के करने को मनुष्य अपराध मानता ही नहीं है। इससे यह प्रमाणित होता है कि कानून के निर्माण से हि अपराध का विकाश हो रहा है।
अतः भारत के आदि पूर्वज लोगों ने यह प्रमाणित किया है कि प्राकृतिक प्राणी मानव आपने प्राकृतिक जीवन क्रिया से अलग होने के कारण अनर्गल आशक्ति (अपने उपभोग को पाने की गलत जिज्ञासा) में आ गया है। जिससे जीवन में अनर्गल चेष्टा पैदा होती है और मनुष्य अपने अनर्गल चेष्टा को प्राकृतिक चेष्टा मानकर उसकी पूर्ति में जो अटूट प्रयास करता है वही अपराध कहलाता है। इसी अनर्गल आशक्ति को समाप्त करने के लिए भारतीय आदि पूर्वज लोगों ने शरीर को चलाने वाले मस्तिष्क के क्रिया विधि की खोज कर मोक्ष का आविष्कार किया था जिसे धर्म के नाम से जाना जाता है अर्थात मनुष्य जीवन का उद्देश्य एवं धर्म का उद्देश्य मोक्ष है और मोक्ष की पूर्ति के लिए सत्य, ज्ञान, ईमान, ब्रह्म की क्रिया में मनुष्य के मानसिकता को स्थापित करने की आवश्यक्ता होती है जिसे कर्म योग एवं ज्ञान योग को आचार संहिता से जीवन पर प्रयोग कर स्थापित किया जाता है। एक मात्र कर्म योग एवं ज्ञान योग वह क्रिया विधि है जिससे मनुष्य आशक्ति रहित होगा अन्य कोई विकल्प नहीं है।
संसार के सभी धर्म काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार, त्रिष्णा को पाप कहते है पर किसी भी धर्म ने इन दुर्गुणों के पैदा करने वाले तत्त्व की पहचान नहीं बतायी है न ही उसके निस्क्रिय करने की विधि का स्पष्ट वर्णन किया है। अर्थात् सभी धर्म अधुरे हैं और इन्हीं अधुरे धर्मों को पूर्ण मानकर समाज की रचना की गई है जिससे मानव समाज अंधेरे में डूबता आया है अर्थात् जीवन में आशक्ति का विकाश होता आया है और इसी दूषित आशक्ति को अपनी प्राकृतिक इच्छा शक्ति मान कर इसके पूर्ति में राजनीति एवं विज्ञान का आविष्कार कर मनुष्य अपने सृष्टि को पतन हो जाने से रोकना चाहता है पर यह सम्भव नही है क्योंकि मानव के मस्तिष्क क्रिया के चार भाग हैं और इन चारों मस्तिष्क क्रियाओं में चार प्रकार के कर्म गुण पाये जाते हैं (१) सामाजिक ज्ञान (२) निर्गुण ज्ञान (३) आध्यात्म ज्ञान (४) तत्त्व ज्ञान। संसार में सर्व प्रथम तत्त्व ज्ञान (उस तत्त्व की पहचान करना जिसके द्वारा शरीर क्रियान्वित होता है) का आविष्कार हुआ था और तत्त्व ज्ञान द्वारा शरीर को अन्तःकरण से कैसे क्रियान्वित किया जायेगा इसी की व्याख्या आध्यात्म ज्ञान है सनातन काल में इसी उपलब्धि के जीवन नीति की व्यवस्था स्थापित थी पर तत्त्व ज्ञान एवं आध्यात्म ज्ञान को समाप्त कर सामाजिक ज्ञान की जीवन नीति स्थापित की गई है और इस सामाजिक ज्ञान के विरुद्ध संत लोगों ने निर्गुण ज्ञान का आविष्कार किया है पर निर्गुण ज्ञान के विरोध से सामाजिक ज्ञान का अन्त नहीं हुआ बल्कि आज सामाजिक ज्ञान ही रह गया है और इस सामाजिक ज्ञान के द्वारा मानव के जीवन क्रिया में नाम मात्र भी कोई परिवर्तन होना सम्भव नहीं क्योंकि यह मस्तिष्क क्रिया प्राकृतिक प्राणी मानव के जीवन क्रिया का पूरक नहीं है पर आज का मानव इसी सामाजिक जीवन क्रिया को अपना प्राकृतिक जीवन क्रिया मानने को मजबूर हो रहा है।
अतः इन चारों ज्ञान पद्धतियों की अलग-अलग व्याख्या समझने के बाद यह ज्ञात होता है कि एक मात्र तत्त्व ज्ञान पद्धति के द्वारा हि मानव के जीवन क्रिया को परिवर्तित किया जा सकता है। अन्य कोई विकल्प नहीं है और यह तत्त्व ज्ञान भगवान शंकर के अलावे अन्य किसी धर्म दाता द्वारा व्यक्त नहीं किया गया है। आज की धार्मिक एवं सामाजिक उपलब्धियों में मात्र निर्गुण ज्ञान एवं सामाजिक ज्ञान का विवरण पाया जाता है तत्त्व ज्ञान एवं आध्यात्म ज्ञान की व्याख्या नहीं पाई जाती है इसलिये तत्त्व ज्ञान शैली की व्याख्या को समझना कठिन होगा पर यह असम्भव नहीं है।
ध्यान देंः सनातन काल जैसे आज भी दूषित आशक्ति पैदा करने वाली भौतिक मस्तिष्क क्रिया को प्रयोग द्वारा समाप्त कर प्रकृतिवाद की अध्यात्मिक मस्तिष्क किया के जीवन नीति की व्यवस्था में स्थापित किये वगैर मानव जीवन का उद्धार होना सम्भव नहीं है।
नोट : – भारतीय काँपीराइट एक्ट के तहत प्रस्तुत सिद्धान्त में निहित समस्त प्रकाशित सामग्री के काँपीराइट हरिनन्द सरस्वती के पास सुरक्षित है अतः कोई भी व्यक्ति अथवा कम्पनी इस लिखित प्रकाषित लेख को किसी भी तरह से तोड़ मरोड़ कर आंशिक या पूर्ण रूप से किसी पुस्तक या सामाजिक न्यू जपेपर मैगजीन इत्यादि में प्रकाशक से बिना लिखित अनुमति के प्रकाशित करने की चेष्टा न करें अन्यथा समस्त कानूनी हर्जे एव खर्चों के स्वयं जिम्मेदार होंगे ।किसी भी प्रकार के मुकदमे के लिए न्याय क्षेत्र दिल्ली रहेगा।
आत्मज्ञान, मोक्ष, परमानन्द-जन्नत, सत्य-ईमान भगवान, खुदा-परमेश्वर, सनातन का वैज्ञानिक विवरण
यह उपलब्धि रिसर्च बुक “सत्य-ईमान की तलाश” पर आधारित है तथा इसमें दिये गये सभी विवरण प्रयोगात्मक प्रमाणित हैं।
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