विश्व में भ्रष्ट मानसिकता नोबल की

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जी हाँ मैं उसी उद्योगपति उलफ्रेंड नोबेल का आलोचक हूँ। जिनके नाम से दुनिया का सबसे बड़ा पुरुस्कार दिया जाता है, जिसे दुनिया के लोग पाकर अपना सौभाग्य मानते हैं। पर इसी मानसिकता के सूत्र से (नागासाकी — हिरोशिमा जापान ) में लाखों लोगों की जान गया था। और आज भी जा रहा है । करोड़ों जीवधारी पेड़—पौधे पल भर में अग्नि में प्रवाहित हो गए थे । क्या इसी मानसिकता के सूत्र से दुनिया मै शान्ति स्थापित की जा सकती है।जो मानसिकता अपने दैनिक जीवन में लोकतंत्र और स्त्रियों के हक दिलाने के विरुद्ध था। क्या यही मानसिकता दुनिया मै शान्ति फैला सकेगी जिसके खोज के सूत्र से पूरी दुनिया में अशांति फैलाने का जरिया बना है। जापान में एक-दो बमों का विनाश था। आज नोबल के खोज के सूत्र पर पूरी दुनिया में हजारों से ज्यादा बम बनकर तैयार है। जो पूरी पृथ्वी को कई बार नष्ट कर सकते हैं । इसके बाद भी परमाणु बम बनाने की होड़ लगी है। इसे देख कर सारी दुनिया भय से कांप रही है ।

एक राजनैतिक देश दूसरे राजनैतिक देश पर आक्रमण की बात करते हैं। जैसे पाकिस्तान द्वारा भारत पर या भारत द्वारा पाकिस्तान पर यह कोई देश नहीं , कोई जाति नहीं ,नहीं कोई धर्म नहीं प्रकृति पर हमले की बात है। क्या मनुष्य यह भूल गया है कि प्रकृति ने यह पृथ्वी बनाई है।कोई जाति कोई धर्म कोई देश नहीं।

यहाँ मनुष्य को जीवन जीने का अधिकार है। नष्ट करने का नहीं नष्ट करना अधर्म है।जो वैज्ञानिक अपने खोज से जीवनदाई प्राकृति को नष्ट करने का खोज करते हैं। वे सभी दुनिया के अपराधियों मैं पहला स्थान होना चाहिए। परमाणु बम भी इस दुनिया का सबसे बड़ा विनाशक खोज है इसे बनाने का सू़त्र भी नोबल को ही जाता है। जिन्होंने इसका खोज किया था। मनुष्य जाति क्या अपना इतिहास भूल गया है । की शान्ति और अशांति मै क्या फर्क है । जो हमारे अनेक धर्मों के खोज करता । इसी मानव समाज को प्रकृति के राहों पर लाने के लिए अनेक प्रयास किये लेकिन मानव समाज ने उन्हें अनेक दुःख दण्ड दिये जो एक जगह से दूसरे जगहों पर विस्थापित होना पड़ा । सुली पर चढ़ना पड़ा। जहर का प्याला पीना पड़ा लंबे समय तक जानलेवा हमला होता रहा फिर भी समाज को एक नई दिशा देने मै कारगर रहें । जैसे शिव, ईसा, मोहम्मद, बुद्ध , महावीर , नानक ऐसे और अनेक नाम प्रमुख है इन्हीं के नाम पर दुनिया की छः अरब जानता का मानसिकत केन्द्र है। और शान्ति मेहसूस करती है इन्हें अपना आदर्श मानती है । इन्हीं के आधार पर आने वाला समय खुसियों का होगा । पर नोबेल की सोच और खोज और अंधकार मृत्यु विनाश के शिवाय क्या देगा, और दे रहा है। जिस वस्तु से भय हो वह इस दुनिया में शान्ति कैसे फैला सकती है। कया दुनिया को शान्ति और अशांति मै फर्क मेहसूस नहीं होता। अशांति से मृत्यु होती है और शान्ति से नया जीवन मिलता है। पर एटम बम से तो पूरे अस्तित्व का ही अंत है। पर दुनिया इस भ्रष्ट खोज पर निगाह रखते हुए भी इस नाम और पुरुस्कार को सबसे बड़ा सम्मान क्यों देती है ।

हम जिस समाज के संस्कारों में जीते हैं उसका न्याय हंस मारने वाले का नहीं बचाने वाले का होता है। पूजनीय महापुरुषों के नाम का पुरुस्कार क्यों नहीं दिया जाता है।

इस श्रेणी मै वे भी शामिल है। जो आपने खोज के सूत्र से हम मनुष्य को नया जीवन दे सके जैसे चरक , शुद्धूत हैन मैन, काउंट सीजर मेट्री व बैच इनका पूरा जीवन मानव मात्र की सेवा मै कठिन परिस्थितियों से गुजरा। पर नोबेल और इनके सोच कर्म समझ मै फर्क कितना है जैसे दानव और देवता कहीं ऐसा तो नहीं कि इतना बड़ा भ्रष्ट विनाशक खोज को समाज की नजरों से छुपाने के लिए दुनिया का सबसे बड़ा पुरुस्कार बनाकर धक दिया हो यह भी एक प्रशन है।

इसे मिटाकर आज ज़रूरत है हमारे इन महात्माओं के विचारों की जो इस अशांति मन में शांति की ज्योति जागा दे । इन्हीं के नाम का दुनियां का सबसे बड़ा पुरुस्कार बनाया जाए । इसी में हमा मानव जाति का जीवन है। और नया सबेरा भी जो राष्ट्र नया एटम बम बनाते हैं। वे कहते हैं।कि मैं किसी देश पर आक्रमण किसी भी रूप मै नहीं करूंगा पर उनका यह एक बहाना है सब कुछ जानते हुए भी सभी बमों का उपयोग भी होगा जैसे अमेरिका द्वारा जापान पर युद्ध में मानसिकता एक विष के समान होती है।और विष में आकर कोई भी व्यक्ति कुछ भींकर सकता है ऐसे समय में व्यक्ति आपने आपकों भी भूल जाता है ।और जिस मानसिकता पर यह बम रखे गए हैं वह सभी सुरक्षित माने जा रहे हैं। जो आज हर व्यक्ति अपनी मानसिकता की वजह से एक दूसरे को नफरत से देखते हैं और अज्ञानतावश रुपये लेकर कुछ भी करने को तैयार है इन सब बातो पर विचार करके क्या कहा जाए कि यह विनाशक बम सौ प्रतिशत सुरक्षित है आज मानव मस्तिक के हीनता का जीता जागता तस्वीर मानव बम है जो सब कुछ जानते हुए भी दूसरे को मारने के लिए अपने ही शरीर में बांधा हुआ बम अपने ही हाथों विस्फोट कर लेता हैं। पलभर मै शरीर चीथड़ों मै बदल जाता हैं।

क्या इन सबको देखते हुए समाज की मानसिकता पर भरोसा किया जा सकता है समाज यह भी कहने का अधिकारी है कि नोबेल सही काम करने के लिए ही इस विस्फोटक का खोज किए होंगे पर ऐसा नहीं है वह अपने अज्ञानता वश अपने शोहरत के लिए किए होंगे जिसमें उन्हें भीं रेडियो अधर्मकिता का महा विनाश दिखता होगा जो बीज बोया जाता है वह किसी जाति पेड़ का होता है ऐसा नहीं कि बिना जाने लगाया गया हो पर किसी भी तरह से जहरीला हो ही गया है तो जहर वही है जो जीवन से मृत्यु की ओर ले जाता हो। तना काटने से हम सब पूरे मानव जाति की सुरक्षा की गारंटी सम्भव नहीं हो सकती हमे उसे जड़ से काटना होगा या उखाड़ कर फेंकना होगा तभी हम और हमारी आने वाली पीढ़ी और यह पृथ्वी मां सुरक्षित रह सकेगी ।

नोट : – इसलिए इस खोज और नाम को मनुष्य इस तरह मिटा दे की इसका अस्तित्व भी न रहे इसी में हम सब मानव जाति की विजय और भलाई है ।

( हरिनन्द सरस्वती = 9811074545 )

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