जज भी एक अपराधी

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Judge Bhi A Criminal

न्याय प्राप्त करना मनुष्य जीवन का उद्देश्य नहीं तथा न्याय प्राप्त करने से अन्याय भी समाप्त नहीं होता है।


अतः न्याय व न्याय पालिका अपने आप में कोई विषय नहीं अन्याय से इन विषयों का जन्म होता है भारतीय व दुनिया की दंड संहिता में मुजरिम वही व्यकित है जिसकेजुर्म का प्रत्यक्ष प्रमाण हो जबकि अप्रत्यक्ष तरह से अपनी मानसिक क्रिया से मजबूर होकर मनुष्य प्रत्यक्ष प्रमाण का जुर्म करता है।अप्रत्यक्ष तरह से मस्तिष्क में जुर्म का चिन्तन न हो यह मनुष्य का उद्देश्य होना चाहिए।पर इसे दण्ड संहिता के द्वारा नहीं प्राप्त किया जासकता
पूरी दुनिया के न्याय पालिका में जो व्यकित न्याय संगत के लिए कार्यरत हैं तथा दण्ड संहिता के आधार पर मुजरिम को सजा देते हैं।सभी न्याय धीश भी मानवता की दृष्टि में अपराध करते हैं।क्योंकि जो मनुष्य जुर्म किया है उसे अपने जीवन जीने का ज्ञान नहीं है अर्थात उनकी मानसिकता अज्ञानता से मजबूर है।

इसलिए वे जो भी कार्य करते हैं वे अपराध होते हैं ।दुनिया में किसी भी राजनैतिक संविधान की सरकार के पास भी कोई सरकारी उल्लेख नहीं है कि मनुष्य में प्राकृतिक मस्तिष्क क्रिया या मानवता केसे पैदा किया जाए।अगर जीवन जीने का प्राकृतिक विधान मनुष्य को उपलब्ध नहीं किया गया है तो अज्ञानता की सजा देना एक संगीन जुर्म है जो न्याय पालिका द्वारा दिया जाता है दण्ड संहिता बनाने से पूर्व यह मान लिया था कि मनुष्य जुर्म करता है फिर दण्ड संहिता का निर्माण किया गया मनुष्य जुर्म करता है। यह उत्तर नहीं है।पर इसके उत्तर मानने से ही मनुष्य जुर्म करता है।

अतः प्रशन यह है कि मनुष्य जुर्म क्यो करता है। इस प्रश्न का उत्तर आज की दुनिया में होना अति आवश्यक है। इस प्रश्न के उत्तर में आदि पूर्वज लोग धर्म बनाये थे पर उसका भी महत्व आधुनिक मानसिकता में लुप्त हो गया है। पूरे विश्व में लोकतंत्र की दण्ड संहिता एवं संविधान प्राकृतिक आचार्य संहिता बगैर महत्वहीन हैं। इससे जुर्म विकास हो रहा है।


अतः हमने सभी धर्मों का अन्वेषण कर एक प्राकृतिक आचार्य संहिता का निर्माण किया है। जो कि आज कि वैज्ञानिक मानसिकता के अनुकूल है।इससे सभी प्रकार की बुराई और बीमारीयों को समाप्त किया जा सकता है

(हरिननद सरस्वती=9811074545 )

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