सनातन धर्म से मजहबे इस्लाम की तुलना भाग - 2

सनातन धर्म से मजहबे इस्लाम की तुलना भाग – 2

(5) सनातन धर्म में मनुष्य की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा या रूह की दो गति बताई गई हैं। ज्ञान-इमान का जीवन जीने वाले का मोक्ष और ज्ञान-ईमान का जीवन नहीं जीने वाले व्यक्ति की रूह या आत्मा की भूत-प्रेत योनि होगी। जिसे हिन्दूधर्म नरक और मजहबे इस्लाम जहन्नुम कहता है। सनातन धर्म के अनुकूल ज्ञान-ईमान का जीवन नहीं जीने वाले व्यक्ति अपने बुरे कर्मों का फल इसी धरती पर भोगते हैं। तथा प्रेत बनकर इसी वायुमंडल में अपनी मुक्ति के लिए तरसते रहते हैं। अर्थात आकाश में कोई स्वर्ग-नर्क या जन्नत-जहन्नुम नहीं है। अतः इस्लाम में कहा गया है कि ज्ञान-ईमान का जीवन नहीं जीने वाले को जहन्नुम की आग में जलाया जाता है और यह सनातन धर्म के विपरीत है। (भारतीय कॉपीराइट एक्ट लागू है)

(6) सनातन धर्म में  ज्ञान-ईमान  मनुष्य का प्राकृतिक जीवन है। इसलिए ईमान कायम नहीं करना होगा बल्कि प्रयोग द्वारा व्यक्ति के मस्तिष्क क्रिया में  अज्ञानता या बेईमानी  पैदा करने वाली तरंग को प्रयोग द्वारा समाप्त किया जायेगा इससे  सत्य या ईमान  अपने-आप कायम हो जायेगा क्योंकि यह मनुष्य का प्राकृतिक जीवन है। जिस तरह मरीज अपनी बीमारी ठीक हो जाने पर अपने स्वास्थ्य हो जाता है। मजहबे इस्लाम में  ईमान-कायम  करने की व्याख्या अंधविश्वास है। और यह सनातन धर्म के विपरीत है। इसी तरह सनातन धर्म मानव जगत पर नारी शासन को श्रेष्ठ मानता है। पर  कुरॉन शरीयत  में इसका महत्व नहीं है। (भारतीय कॉपीराइट एक्ट लागू है)

(7) इस्लाम में ईमान कायम करने के लिए  जिहाद  चलाने को बताया गया है। यह  सनातन धर्म  के विपरीत है अर्थात सनातन धर्म में किसी  जिहाद या हिंसा  का कोई स्थान नहीं है। सनातन धर्म में  ज्ञान-ईमान  मनुष्य का सबसे बड़ा हथियार माना गया है। जैसे महात्मा गाँधी ने  सत्य-ईमान  के द्वारा अहिंसा के रास्ते पर चलकर  अंग्रेजों  से भारत को आजाद करा लिया। इसी तरह दक्षिण अफ्रीका के नेशनल मंडेला ने भी गांधी जी के बताये  सत्य-ईमान  के द्वारा अहिंसा के रास्ते पर चलकर दक्षिण अफ्रीका को आजाद करा लिया था। अभी वैज्ञानिक सिद्धान्त से  सत्य – ईमान  कायम होने पर मानव मस्तिष्क से हिंसा का  अस्तित्व  सर्वदा के लिए समाप्त हो जायेगा । (भारतीय कॉपीराइट एक्ट लागू है)

नोट : – भारतीय काँपीराइट एक्ट के तहत प्रस्तुत सिद्धान्त में निहित समस्त प्रकाशित सामग्री के काँपीराइट हरिनन्द सरस्वती के पास सुरक्षित है अतः कोई भी व्यक्ति अथवा कम्पनी इस लिखित प्रकाषित लेख को किसी भी तरह से तोड़ मरोड़ कर आंशिक या पूर्ण रूप से किसी पुस्तक या सामाजिक न्यू जपेपर मैगजीन इत्यादि में प्रकाशक से बिना लिखित अनुमति के प्रकाशित करने की चेष्टा न करें अन्यथा समस्त कानूनी हर्जे एव खर्चों के स्वयं जिम्मेदार होंगे ।किसी भी प्रकार के मुकदमे के लिए न्याय क्षेत्र दिल्ली रहेगा।

हमसे जुड़ें

हमारी आध्यात्मिक यात्रा में सहभागी बनें। संन्यासी स्वामी बिजुली नन्द सरस्वती जी के विचार, संदेश और कार्यक्रमों से जुड़ी ताज़ा जानकारी पाने के लिए हमें फेसबुक, इंस्टाग्राम और लिंक्डइन पर फॉलो करें। आइए, साथ मिलकर एक प्राकृतिक और शांतिपूर्ण जीवन की ओर कदम बढ़ाएँ।