रिसर्च

Research

1. हमारे खोज में प्राचीन इतिहास से ज्ञात हुआ है :-

कि लगभग 9000 वर्ष ईस्वी पूर्व या नये पाषाण काल से पूर्व पृथ्वी पर एक भीषण मौसम दुर्घटना होकर हिम युग आया था जिससे मनुष्य का प्राकृतिक भोजन अन्न एवं फल का उपार्जन समाप्त हो गया और मनुष्य अपने भोजन अभाव में मजबूर होकर 100% कच्चा मांसाहारी भोजन किया, इसी दूषित भोजन के तत्त्व दुर्गुण के कारण शरीर को चलाने वाली “मन की तरंग” भयभीत होकर मस्तिष्क के अग्र भाग में बैठ गई है (इसको दोनों चित्रों में देखें) इसी कारण मस्तिष्क सामान्य से लगभग 90% अधिक आक्सीजन ले रहा है जबकि प्राकृतिक मस्तिष्क क्रिया के जीवन में स्थापित होने पर मस्तिष्क आक्सीजन नहीं लेता है बल्कि फेफड़ा मात्र 10% आक्सीजन लेता है। अधिक आक्सीजन
लेने के कारण ही मनुष्य के मस्तिष्क में पीछे की भाग से प्राकृतिक जीवन जिने का सभी प्रोग्राम समाप्त होकर उसके स्थान पर मस्तिष्क के अग्र भाग में भौतिक मस्तिष्क क्रियान्वित हो गया है, जिसके तरंग में जीवन जीने का प्रोग्राम नहीं है। इसी अज्ञान मानसिकता के कारण मनुष्य आदि काल में उत्तेजित होकर अपने इन्द्रियों का दुर्पयोग करने लगा था जिसे असभ्यता कहते हैं तथा इस दूषित मांसिकता के व्यक्ति की मृत्यु के बाद इसकी आत्मा प्रेत के रुप में वायु मंडल में रह गई थी जो आत्मबल हिन व्यक्ति को पकड़ लेती थी जिससे व्यक्ति सामान्य से अननंत गुना अधिक उत्तेजित हो जाता और अपना मानसिक संतुलन खोकर पागलों जैसे व्यवहार करने लगता था। यह आदि काल के भोले भाले मनुष्य पर सबसे बड़ी विपत्ति थी उस समय इससे पूरी मानवता भयभीत हो गई थी। इस विपत्ति से मनुष्य को बचाने के लिए सर्व प्रथम पुर्तगाल देश में पारसी धर्म का आविष्कार हुआ था जिसमें प्रेत आत्मा के आक्रमण से मनुष्य की रक्षा के लिए घर-घर में आग जलाना अनिवार्य बनाया गया है मनुष्य आत्मबल हिन न हो इसके लिए नर नारी के सम्बंध बनाने पर सख्त प्रतिबंध लगाये गये हैं तथा साफ-सफाई पर बहुत अधिक ध्यान दिया गया है। पारसी धर्म में अपने अज्ञान भौतिक मस्तिष्क को प्राकृतिक मस्तिष्क समझा गया है तथा इसके अज्ञानता को समाप्त करने के लिए दुसरे व्यक्ति की जीवन नीति का प्रोग्राम दुसरे व्यक्ति के मस्तिष्क में रिकार्ड कराने के लिए शिक्षा विधि को प्रचलित किया गया था जिसे सभ्यता कहते हैं। कुछ समय बाद यूनान में इस सभ्यता के लोग अपने समुह को एक साथ रखने के लिए लिखित विधि बनाई जिसे सम्विधान कहते हैं तथा गलत कर्म पर प्रतिबंध लगाने के लिए कानून बनाय गया था इससे यह पारसी धर्म ही यूनानी सभ्यता में बदल गया। इन लोगो ने दूसरे कबिले के लोगो से अपने को सुरक्षित रखने के लिए तथा जंगली जानवरों को मारने के लिए और दूषित मस्तिष्क से उत्पन्न बीमारियों को समाप्त करने के लिए विज्ञान द्वारा ना-ना प्रकार का आविष्कार किया है। जिसकी उपलब्धि बृहद उत्तेजित हुआ आज का यह भौतिक जीवन है, पर भारत में इस भौतिक मस्तिष्क के दूषित तरंग को समाप्त कर पुनः मनुष्य को प्राकृतिक जीवन के मस्तिष्क में या मौसम दुर्घटना के पूर्व के मस्तिष्क क्रिया के जीवन में स्थापित करने के लिए बाबा आदम या भगवान शंकर ने शिव लिंग का अविष्कार किया, तथा शिव लिंग का दर्शन कर उसका हृदय में चित्र बनाकर मन की तरंग को मस्तिष्क के अग्र भाग से शरीर में उतारा था और नाद या नगाड़े की आवाज का प्रयोग कर मस्तिष्क के पीछे भाग में स्थापित आदि शक्ति या शिव शक्ति मस्तिष्क की इलेक्ट्रिक तरंग या प्राकृतिक मस्तिष्क क्रिया को क्रियांवित करके सनातन धर्म या मोक्ष के जीवन क्रिया की खोज किया था, और यह प्रकृतिवाद है। इसी मस्तिष्क परिवर्तन क्रिया का नकल करके इस्लाम यहुदी इसाई बुद्ध जैन आदि धर्मों का आविष्कार हुआ है।

2. मन की तरंग मानव मस्तिष्क के अग्र भाग में स्थापित हुई है इसका वैज्ञानिक प्रमाण :-

 एक चार महीने के लड़के को सोई हुई अवस्था में देखें वह लड़का कभी हसंता है, कभी रोता है। हसंते समय उसके होठों पर कोई शक्ति सूक्ष्म रूप से चलती हुई
दिखाई देती है कभी वह तरंग मस्तिष्क में चली जाती है और वह लड़का लम्बी-लम्बी श्वांस लेकर रोने लगता है। ऐसे ही नाममात्र अंतराल में वह शक्ति बच्चे के हाथ तक जाती है और उसके हाथ में फड़कन (हरकत) पैदा होने लगती है फिर चंद समय में वह शक्ति बच्चे के लिंग तक जाती है और बच्चे का लिंग चैतन्य होने लगता है अर्थात उसमे रक्त भरने लगता । यही वह मन की तरंग है, जिसके साथ प्राणवायु के रक्त का दबाव भी चलता रहता है। मानव के शरीर में यही मन की तरंग प्राणवायु के रक्त का दबाव लेकर मस्तिष्क के अग्र भाग में स्थापित हो गई है। “इससे मस्तिष्क अधिक रक्त दबाव के कारण अधिक उर्जावान होकर लगभग 90% तक अधिक आक्सीजन ले रहा है”। अगर मन की तरंग होठ पर स्थापित हो जाए तो मस्तिष्क आक्सीजन नहीं लेता और मनुष्य खुश हो जाता है अगर मन की तरंग को प्रयोग द्वारा शरीर के अंदर स्थापित करा दिया जाय तो मनुष्य भी सभी प्राणियों की तरह अन्तर्मुखी हो जायेगा।

ध्यान दें इन दोनों चित्रों में मस्तिष्क के जो नाम हैं वह सनातन धर्म से लिए गये हैं।

4. मनुष्य के प्राकृतिक जीवन को मात्र 10% श्वांस की जरूरत होती है इस खोज का वैज्ञानिक प्रमाण :-

 एक घबराया हुआ व्यक्ति जो लम्बी – लम्बी श्वांस ले रहा है उसको समतल जमीन पर दरी या कोई चद्दर बिछाकर वगैर तकिया पीठ के बल लेटाकर उसके मुंह पर एक बारीक्त कपड़ा डाल दें तथा एक छड़ी से उसके पांव के तलवे पर स्पर्स करें और उसको वहां ध्यान दिलाएं, पुनः छड़ी को उठाकर पांव के आँगली पर स्पर्स करें उसको वहां ध्यान दिलाएं ऐसे ही शरीर पर 20-25 जगह स्पर्स करके व्यक्ति को वहां ध्यान दिलायें, लगभग 10 मिनट में उसके मस्तिष्क तक पहुंचे इससे मन की तरंग जो मस्तिष्क में स्थापित थी जिससे रक्त का दबाव मस्तिष्क की तरफ था वह मन की तरंग के साथ शरीर में उतर जाएगी इससे उस व्यक्ति की श्वांसगति मात्र 10% से 20% तक शेष रह जाती है और वह घबराया हुआ व्यक्ति आनंदमय हो जाता है पर यह क्रिया क्षणिक होती है (इस प्रयोग क्रिया को होम्यों पैथ के आविष्कारक हेनिमेन ने भी दिया है)। हमारे प्रयोगशाला में मन की तरंग को स्थाई रूप से शरीर में उतार दिया जायेगा इससे सामान्य अवस्था में उसकी श्वांस गति पूर्व की अपेक्षा मात्र 10% शेष रह जायेगी | ध्यान दें मुझसे पूर्व राजस्थान भरतपुर के दुर्बल नाथ नाम के एक संत ने भी अपनी दोहावली में कहा है कि “श्वांस मतर के रोक बिन रुकता नहीं मन नीच” और अमेरिका के मस्तिष्क वैज्ञानिक भी यह खोज किये हैं कि मस्तिष्क आवश्यकता से अधिक आक्सीजन ले रहा है पर वे यह नहीं जानते कि मस्तिष्क आक्सीजन क्यों ले रहा है। प्राकृतिक ईच्छा शक्ति की जीवन क्रिया में मस्तिष्क आक्सीजन नहीं लेता बल्कि फेफड़ा मात्र 10% आक्सीजन लेता है।

5. संछिप्त में परमानन्द, स्वर्ग, जन्नत का वैज्ञानिक विवरण :-

जब पति पत्त्री आपस में सृष्टी विकास क्रिया करते हैं तो अंत में पति अपना वीज पत्नी के गर्भ में इंजेक्ट करता है उस समय क्षणिक मस्तिष्क क्रिया बंद होकर पति के मुंह में एक अस्वादिष्ट लार ग्रन्थि निकल आती है। यह मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा आनंद है इसके समक्ष संसार के अन्य किसी भी आनंद का कोई महत्व नहीं है पर यह आनंद क्षणिक है। हमारे प्रयोग द्वारा मस्तिष्क को अधिक समय के लिए बंद करा दिया जाये और वह अश्वादिष्ट लार ग्रंथि लगातार बहने लगे तो यह परमानंद, स्वर्ग, जन्नत के आनंद का जीवन है। ध्यान दें – जब हम प्रयोग द्वारा अपने जीवन क्रिया को परमानंद में स्थापित किये तो हमे ज्ञात हुआ कि मनुष्य को छोड़कर अन्य सभी प्राणी परमानंद का जीवन व्यतीत करते हैं क्योंकि मानव को छोड़कर अन्य सभी प्राणी एक दुसरे के साथ नंगे रहते हैं पर नर प्राणी परमानंद में रहने के कारण, नारी के अनुकूल एवं नारी के अधीन केवल सृष्टि विकास क्रिया की पूर्ति करता है, पर मानव में नर प्राणी सृष्टि विकास क्रिया नहीं करता वल्कि अपने जीवन से परमानंद के लुप्त हो जाने के कारण इसी आनंद की क्षणिक प्राप्ति में नारी को अपने अधीन करके उसकी ईच्छा के विपरीत सर्वदा सेक्स करता रहता है, सृष्टि विकास इत्तफाक है । अतः इसी परमानन्द की छणिक प्राप्ति में मनुष्य सभी प्रकार का नशा करने को मजबूर हुआ है।

6. मानव के शरीर को वैक्टिरियल प्रूफ बनाने का वैज्ञानिक प्रयोग प्रमाण :-

(1) -हम एक केंचुआ प्राणी को जाते हुए दखे रहे थे उसके बगल से एक काला चींटा आया और केंचुवे के शरीर से टकरा गया तथा अपने भोजन की सुगंध पाकर केंचुवे के शारीर को काटने लगा | केंचुवे के मुंह के पास से उसकी चमड़ी के नीचे रेडियम जैसे चमकीला एक तरल पदार्थ केंचुवे की पूंछ की तरफ चलने लगा और चींट के काटते ही केंचुबे के शरीर से चमकीले तरल पदार्थ की एक बूंद चीट के महूं पर गिर गई उससे चींटा वहीं अकड़ कर मर गया जैसे विद्युत तरंग से प्राणी की मृत्यु होती है। हमारे खोज के अनुकूल प्रकृति द्वारा सभी प्राणियों के शरीर में सुरक्षा कवच की ऐसी ही बिद्युत तरंग क्रियान्वित है। (2) हम अपनी नौकरी के समय विशाखापट्टनम गए थे वहां समुद्री हवा से हमारी पिसाब इन्द्रि के दोनों तरफ जांघों में दाद जैसी बीमारी हो गई और उसमे खुजली होने लगी तथा उससे पानी निकलने लगा इससे हमारी चड्डी गीली रहती जिससे हमे घृणा होती थी ऐसा दो – तीन दिन हुआ तीसरे दिन रात को सोते समय हम अपनी इस बीमारी पर ध्यान एकाग्र किये तो सुबह हमने पाया कि हम पूर्व की अपेक्षा अधिक आनंदमय हैं और हमारे जांघों पर किसी प्रकार के जख्म का दाग तक नहीं है। यह चमत्कार भी आदि शक्ति के तरंग की सक्रियता से हुआ था (3) आदि शक्ति मस्तिष्क में अधिक उत्तेजना पैदा होती है तो वह छींक द्वारा बाहर निकलती है और मनुष्य छींक आने के बाद पूर्व की अपेक्षा अधिक आनंदमय हो जाता है अर्थात आदि शक्ति मस्तिष्क की उत्तेजना ही मनुष्य जीवन का आनंद है। (4) -कोई भी व्यक्ति अपने शरीर पर वर्फ रखकर देखे उसके रोगंटे खड़े हो जाते है क्योंकि बर्फ से अपने शरीर की सुरक्षा में, आदि शक्ति की तरंग का शक्ति शाली प्रवाह मस्तिष्क से उसकी चमड़ी के नीचे निकल आती है इसके प्रभाव से उस मनुष्य के चेहरे पर मुस्कान भी दिखाई देने लगती है इससे यह अचल प्रमाणित होता है कि आदि शक्तितरंग की निस्क्रियता ही मनुष्य का दुःख है और आदि शक्ति तरंग की सक्रियता ही मनुष्य जीवन का परमानंद है। (5)- हमने सन 1974-75 में अर्थात अपने प्रारम्भिक जीवन में अपने भौतिक मस्तिष्क को समाप्त करने की क्रिया प्रारम्भ किया तो कुछ समय बाद आदि शक्ति की इलैक्ट्रिक तरंग हमारे जीवन में क्रियान्वित हो गई थी जिससे शरीर परमानंद होने लगा और इसके सक्रियता से हमारे शरीर की चमड़ी के नीचे से कील, मोहासी के रूप में शरीर के दूषित तत्त्व कष्ट रहित शरीर से बाहर निकलने लगे जिसके निशान आज भी हमारे पूरे शरीर पर हैं। शरीर पवित्र होने की इस क्रिया को हम कुछ समय बाद समझे थे। ऐसे ही हमारा शिष्य जिसको हमने भौतिक वादी मस्तिष्क क्रिया का जीवन समाप्त कर प्रकृतिवादी बनने का प्रयोग कराया तो कुछ महीने के बाद आदि शक्ति के प्रभाव से उसके शरीर से भी दूषित तत्त्व उसकी चमड़ी से बाहर निकलने लगे जिसका निशान उसके पूरे शरीर पर है। जिस तरह व्यक्ति अपने कपड़े को धोकर निचोड़ता है उसी तरह प्रयोग द्वारा मनुष्य के प्राकृतिक मस्तिष्क की तरंग शरीर में क्रियांवित होती है तो शरीर के दूषित तत्त्व को निचोड़कर बाहर निकलती रहती है। (6) शादी ब्याह के शुभ समय पर जब ब्रासबैंड बजता है तो उसकी आवाज सुनकर व्यक्ति के शरीर में उत्साह उमंग अपने आप पैदा हो जाता है बग्ने उछलने लगते हैं ऐसे ही बन्दर प्राणी के समूह में ऐत्ती आवाज करने पर बन्दर उमंगित होकर पेड़ों पर इतनी तेजी के साथ दौड़ते हैं की पेड़ों के डाल – पात टूटने लगते है, क्योंकि ब्रास बैंड की आवाज से आदि शक्ति मस्तिष्क की तरंग में उत्तेजना पैदा हो जाती है जिससे जीवन आनंदित होकर चैतन्य हो जाता है। हमारे प्रयोग शाला में कैंसर के मरीज को एकांत जगह में केमिकल के प्रयोग से भौतिक मस्तिष्क को निस्क्रिय कराया जायेगा और ब्रास बैंड के बड़े इम की आवाज का प्रयोग कर इस बीमारी का इलाज किया जायेगा।

7. भौतिक ईच्छा शक्ति या मस्तिष्क समाप्त करने एवं प्राकृतिक ईच्छा शक्ति को क्रियान्वित करने का प्राचीन काल का प्रयोग प्रमाण :-

मनुष्य की भौतिक मस्तिष्क क्रिया या ईच्छा शक्ति ओडियो जैसे कार्य करती है और प्राकृतिक मस्तिष्क क्रिया वीडियो या दर्शन शास्त्र जैसे कार्य करती है। आदि काल में भौतिक ईच्छा शक्ति के निर्माण के कारण प्राकृतिक ईच्छा शक्ति की दर्शन क्रिया समाप्त हो गई थी प्राकृतिक ईच्छा शक्ति को पुनः दार्शनिक बनाने के लिए सर्व प्रथम भगवान शंकर ने शिव लिंग का अविष्कार किया तथा उसके दर्शन से अपने हृदय में उसका चित्र बनाकर मन की तरंग को मस्तिष्क के अग्र भाग से शरीर में उतार कर अपने भौतिक मस्तिष्क को समाप्त किया है और नाद या नगाड़े की आवाज द्वारा अपने प्राकृतिक मस्तिष्क क्रिया को क्रियान्वित कर तत्त्व ज्ञान पर आधारित “सामवेद” उतारा है। लगभग पांच हजार वर्ष बाद भगवान शंकर या बाबा आदम की नकल कर हजरत इब्राहीम ने एक गोल पत्थर को एक जगह पर रखकर उसका नाम काबा रखा तथा उसके दर्शन से अपने हृदय में चित्र बनाकर मन की तरंग को मस्तिष्क से उतार कर अपने भौतिक मस्तिष्क क्रिया को समाप्त किया है और अपने प्राकृतिक मस्तिष्क द्वारा “कुअरान पाक” उतारना प्रारम्भ किया था, उन्हीं की मस्तिष्क परिवर्तन क्रिया की नकल करके मूसा अली सलाम ने मजहबे यहूदी बनाया है, तथा उन्हीं की नकल हजरत ईसा अली सलाम ने किया पर उन्होंने अपने हृदय में काबा के दर्शन का चित्र नहीं बनाया वल्कि क्रास “+” के दर्शन का चित्र अपने हृदय में बनाकर अपने भौतिक मस्तिष्क को समाप्त किया है। मुहम्मद साहब ने भी हजरत इब्राहीम के जैसे ही काबा में रखे गोल पत्थर का अपने हृदय में चित्र बनाया और इससे अपने भौतिक मस्तिष्क को समाप्त कर प्राकृतिक मस्तिष्क द्वारा कुअरान पाक को सम्पन्न किया है। महाबीर स्वामी जैन की छाती के ऊपर एक फूल का निशान है अर्थात उन्होंने उस फूल का हृदय में चित्र बनाकर अपने भौतिक मस्तिष्क को निस्क्रिय किया था । महात्मा बुद्ध ने माटी का एक गोल पिंड बनाकर उसका दर्शन किया तथा उसका अपने हृदय में चित्र बनाकर अपने भौतिक मस्तिष्क को निस्क्रिय किया है। महात्मा कबीर साहब ने एक नग की एक माला धागे से अपने गले में पहनकर उसको अपने हृदय पर रखा और उसका चित्र बनाकर अपने भौतिक मस्तिष्क को निस्क्रिय किया था । रजनीश ने कुण्डली व्यायाम द्वारा अपने भौतिक मस्तिष्क को निस्क्रिय किया, पर किसी धर्मात्मा ने भगवान शंकर जैसे नगाड़े की आवाज का प्रयोग करके अपनी आदि शक्ति मस्तिष्क को अचल क्रियान्वित नहीं किया है इसी कारण सभी धर्म मजहब में विवाद रहता है तथा समय समय पर सभी धर्म विभाजित होते रहे हैं।
ध्यान दें – हमने बचपन में अपने जिन पूर्वजों को अपनी आखों से देखा है वे हमसे बहुत ही सरल साधारण थे इसलिए चार- पांच सौ वर्ष पूर्व मनुष्य की मानसिकता प्रकृतिवाद के बहुत नजदीक थी जिसे सरलता से परिवर्तित किया जा सकता था पर आज की जटिल हुई मानसिकता को वैज्ञानिक सिद्धांत से विशेष प्रयोग द्वारा परिवर्तित किया जाएगा।

“ईश्वर आप की सहायता करे”

नोट : – भारतीय काँपीराइट एक्ट के तहत प्रस्तुत सिद्धान्त में निहित समस्त प्रकाशित सामग्री के काँपीराइट हरिनन्द सरस्वती के पास सुरक्षित है अतः कोई भी व्यक्ति अथवा कम्पनी इस लिखित प्रकाषित लेख को किसी भी तरह से तोड़ मरोड़ कर आंशिक या पूर्ण रूप से किसी पुस्तक या सामाजिक न्यू जपेपर मैगजीन इत्यादि में प्रकाशक से बिना लिखित अनुमति के प्रकाशित करने की चेष्टा न करें अन्यथा समस्त कानूनी हर्जे एव खर्चों के स्वयं जिम्मेदार होंगे ।किसी भी प्रकार के मुकदमे के लिए न्याय क्षेत्र दिल्ली रहेगा।

अपना पंथ फाउण्डेशन की पुस्तक का अध्यात्मिक नाम आदिशक्ति पुराण और राजनीतिक नाम भारतीय प्रचीन इतिहास तथा वैज्ञानिक नाम रिसर्चबुक या जीवनज्ञान है ।

आदिशक्ति पुराण

(सत्युग-ईमान का पैगाम)

आत्मज्ञान, मोक्ष, परमानन्द-जन्नत, सत्य-ईमान भगवान, खुदा-परमेश्वर, सनातन का वैज्ञानिक विवरण

यह उपलब्धि रिसर्च बुक “सत्य-ईमान की तलाश” पर आधारित है तथा इसमें दिये गये सभी विवरण प्रयोगात्मक प्रमाणित हैं।

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