प्राचीन इतिहास के अनुकूल पारसी सभ्यता का विकास

प्राचीन इतिहास के अनुकूल पारसी सभ्यता का विकास

 
प्राचीन इतिहास के अनुकूल पारसी सभ्यता विकास की खोज से एक – डेढ़ हजार वर्ष बाद तथा आज सन् 2022 से लगभग 10,000 वर्ष पूर्व भारत वर्ष में * ब्लैक इंडियन नस्ल * के भगवान शंकर ने अपने मस्तिष्क क्रिया का अन्वेषण कर प्रयोग द्वारा मस्तिष्क के अग्र भाग से मांसाहारी भोजन से दूषित हुई मन की तरंग को ** कर्म योग एवं ज्ञान योग या नमाज़ ** द्वारा शरीर में उतार कर मनुष्य के मस्तिष्क के अन्दर पीछे के भाग में एक आदि-शक्ति या शिव-शक्ति या भगवान या खुदा का नूर नाम की इलेक्ट्रॉनिक तरंग जैसी शक्ति है जो मौसम दुर्घटना से निष्क्रिय हो चुकी थी उसे नाद की आवाज द्वारा पुनः क्रियान्वित किया और परमानंद में स्थापित होकर अपने जीवन को क्रियान्वित करने वाले मस्तिष्क की अलग-अलग तरंगों की पहचान किया था इसी को ** तत्व ज्ञान ** कहते हैं ।
इसी तत्व ज्ञान पर आधारित उनहोंने ** सामवेद ** की रचना की थी । भगवान शंकर के अनुकूल मस्तिष्क के चार भाग हैं और चारों भागों में चार तरह की तरंगें क्रियान्वित हैं ! मस्तिष्क में पीछे की तरफ मस्तिष्क नं-1 भगवान या खुदा का नूर या आदि-शक्ति या शिव-शक्ति या शूद्र नाम की तरंग है , इससे उपर मस्तिष्क नं- 2 ब्रह्मा या ब्राह्मण मस्तिष्क की तरंग है , इससे आगे मस्तिष्क नं- 3 इंद्र या क्षेत्रीय नाम की तरंग है , इससे आगे ललाट पर मस्तिष्क नं-4 विष्णु या वैश्य नाम की तरंग है । ब्रह्मा मस्तिष्क की तरंग से शरीर को चलाने के लिये प्राण-वायु एवं नारद या मन दो प्रकार की तरंगें पैदा होती हैं और इन्ही छः तरंगों से मनुष्य अपने जीवन को क्रियान्वित करता है अपने-आप के अन्दर इनकी एवं इनके क्रिया की पहचान कर लेने के बाद व्यक्ति तत्व ज्ञानी ** शिव ** हो जाता है । और इसके बाद ज्ञान की सीमा समाप्त हो जाती है ।
ध्यान दे = जो व्यक्ति अपने जीवन का तत्व ज्ञानी होगा एक मात्र वही व्यक्ति इस युग को परिवर्तन कर सकता है अन्य कोई नहीं ।
हमारे रिसर्च बुक में इसका सचित्र विवरण दिया गया है तथा इन्हीं चार अलग-अलग मस्तिष्क क्रियाओं के शासन में रहे युग को सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलयुग कहतें हैं ।
अतः इन्द्रियों के पवित्र प्रयोग का विवरण अध्यात्मिक कहलाता है इस पर आधारित भगवान शंकर ने सामवेद उतारा था ।
सामवेद में मनुष्य के मष्तिष्क से बुराई पैदा करने वाली तरंग को समाप्त करने तथा परमानन्द या जन्नत के प्राकृतिक जीवन आनन्द में मनुष्य को स्थपित करने की प्रयोग विधि थी जिस प्रयोग द्वारा मनुष्य अपने प्राकृतिक जीवन में सरलता से स्थापित होकर पूर्ण हो जाता था और ब्रह्मा ऋषि के ब्रह्मा पुराण द्वारा अपने पवित्र जीवन कर्म को ज्ञात करता था ।इसी प्राकृतिक जीवन क्रिया को मोक्ष करते हैं इसके बाद मोक्ष के लिए मनुष्य को किसी अन्य पुस्तक की आवश्यकता नहीं है । आज हिन्दू धर्म के नाम पर जितनी भी पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं उनको ब्राम्हणों ने भारतीयों में भ्रम पैदा करने के लिए बनाया है।
इस मोक्ष के रहस्य को जानने के बाद धर्म की परिभाषा स्पष्ट हो जाती है जो तक मानव जगत में नहीं थी।
धर्म की परिभाषा = मनुष्य सभी प्राणियों की तरह एक प्राकृतिक प्राणी है वह आदिकाल की एक मौसम दुर्घटना से अपने प्राकृतिक मस्तिष्क क्रिया के जीवन से अलग हो गया है उसे पुनः प्राकृतिक मस्तिष्क क्रिया के जीवन में जिस प्रयोग या जिस आचार्य संहिता द्वारा स्थापित किया जायेगा मात्र वही धर्म है और प्राकृतिक जीवन क्रिया में स्थापित होना ही मोक्ष है एवं मनुष्य जीवन का यही उद्देश्य है ।
सनातन काल में मोक्ष के इस जीवन क्रिया को देश के जन-जना तक पहुँचाने के लिए मनुऋषि ने एक संवैधानिक व्यवस्था किया था जिसे आज मनुस्मृति कहते हैं। मनुस्मृति द्वारा भारतीय समाज जिसकी जनसंख्या 10.000 वर्ष पूर्व मात्र कुछ लाखों में थी उनको शूद्र ,ब्राम्हण ,क्षत्रिय ,वैश्य चार वर्णो में विभाजित किया था पर इनमे बडे-छोटे का कोई भेदभाव नहीं था किसी भी वर्ण की कन्या की शादी किसी भी वर्ण में होती थी | शूद्र भारतीय समाज के डायरेक्टर लोग थे जिन्हें आज संन्यासी कहते हैं ये लोग समाज के एक-दो प्रसेंट ही थे संन्यासी लोग आग नहीं छूते थे वल्कि भारतीय समाज से पके हुए भोजन की भिक्षा मांग कर जीवन व्यतीत करते थे और नारी को प्रकृति समझकर उसके शासन के आधीन भारतीयओ को रखा था
जैसे सत्ययुग का शासन दुर्गा, चंडी, कालका आदि देवियाँ तथा संन्यासी लोग समाज को प्रकृति के अनुकूल चलाने के लिए ब्राम्हण वर्ग को आदेश देते थे | ब्राम्हण लोग समाज के 3-4 प्रसेंट होंगें अपने भोजन के लिए समाज से कच्चे अन्न की भिक्षा लेते हुए संन्यासी के आदेश को अपने क्षेत्र के सभी लोगों तक पहुंचाते थे | तथा कोई व्यक्ति सनातन के विपरीत कर्म नहीं करे इसके लिए क्षत्रिय लोगों को आदेश देते थे क्षत्रिय वर्ण भी लगभग 3-4 प्रसेंट ही थे ये लोग भी भोजन के लिए वैश्य समाज पर आधारित थे | उस समय इस पवित्र सनातन धर्म के [ प्राकृतिक समाजवाद ] के कारण भारत वासियों की जीवन शैली पवित्र होकर सनातन धर्म के आधीन हो गई थी तथा [ मोक्ष ] हम भारतीययों के जीवन का उद्देश्य बन गया अर्थात सभी भारतीय पाप-पुण्य से दूर रहकर [ मोक्ष ] का जीवन व्यतीत करने लगे थे इसमें शिक्षा का कोई स्थान नहीं था क्योंकि प्राकृतिक जीवन ज्ञान के समक्ष शिक्षा का कोई महत्व नहीं है | यह व्यवस्था दूषित मानसिकता के परसी धर्म की मनगढ़ंत के जैसे नहीं बल्कि मांसाहारी भोजन से दूषित हुई मानसिकता को प्रयोग द्वारा समाप्त कर मौसम दुर्घटना से पूर्व के प्राकृतिक जीवन क्रिया के मस्तिष्क में मनुष्य को पुनः स्थापित करना है इसलिए यह व्यवस्था प्रकृतिबाद खुदा-परस्ती है |
भारत का सम्पूर्ण मानव समाज इस सनातन धर्म के कारण प्रकृति के अनुकूल परमानंद जीवन व्यतीत करने के कारण सुख – शान्ति – आनन्द पूर्ण रहता था इनको अन्य कोई आवश्कता नहीं थी | सनातन के प्राकृतिक समाज में शूद्र एंव ब्राम्हण वर्ण अर्थहीन एक भिक्षु का जीवन व्यतीत करते थे तथा देश की आर्थिक व्यवस्था को क्षत्रिय लोगों के मुखिया को समर्पित किया था और क्षत्रिय लोगों का मुखिया अपने क्षत्रिय लोगों के सहयोग से समय – समय पर शासन के आदेश के अनुकूल आर्थिक सहायता को जन – जन तक पहुंचाता था | इस सरल साधारण एंव पवित्र खुशहाल जीवन को देखकर विश्व के अन्य देशों ने प्रभावित होकर भारत के साथ व्यापार एंव संस्कृति का आदान – प्रदान प्रारंभ किया | उस समय सनातन धर्म से सभी भारतियों के कर्म सत्य एंव पवित्र हो चुके थे इससे भारत कुछ ही समय में सोने की चिड़िया बनकर विश्व का विश्व गुरु देश हो गया था इसी समय काल को सत्ययुग कहते हैं [ आज भी लोकतंत्र की जो व्यवस्था है उसमे भी जो विधायका शूद्र है ,कार्यपालिका ब्राम्हण है ,न्यायपालिका एंव पुलिस विभाग क्षत्रिय है , और अन्य पूरे देश की जनता वैश्य है ] अर्थात आज भी वही व्यवस्था है जो सनातन काल में थी केवल इस व्यवस्था में सनातन धर्म के मनुस्मृति जैसे पवित्रता एंव सत्यता नहीं |
 
( सन्त हरिनन्द सरस्वती = 9811074545 )

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