अपना पथ एक आध्यात्मिक समूह है जो ध्यान, सेवा और आत्मबोध के माध्यम से लोगों को आंतरिक शांति, प्रेम और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा और दिशा प्रदान करता है।
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REAL TRUTH OF LIFE & SCIENTIFIC THEORY OF
सत्य या ईमान का पैगाम
युग परिवर्तन का सिद्धान्त
A – (5) : – सम्पूर्ण विश्व का प्राचीन इतिहास सभ्यता विकास को 9000 ई0 पूर्व का कहता है अर्थात इससे पूर्व मनुष्य का जीवन सभी अन्य प्राणियों के जैसे ही प्राकृतिक था । हमारी खोज के अनुकूल सभ्यता से पूर्व एक मौसम दुर्घटना हुई और हिमयुग आया था इसके द्वारा धरती से फसल एवं पेड़ो से बीजाहारी मनुष्य का भोजन उपार्जन समाप्त हो गया था जैसे कश्मीर में सर्द ॠतू आने से पूर्व होता है इससे भोजन अभाव में मनुष्य ने मजबूर होकर 100 % कच्चा मांसाहारी भोजन किया था ।
ध्यान दें = इक्कीसवीं सदी के प्रारम्भ में अमेरिका हड्डी का पाउडर बनाकर उसे गायों के चारे में मिलाकर शाकाहारी गायों को खिलाया था और इस चारे को खाने वाली सभी गायें पागल हो गईं थी अर्थात उनकी प्राकृतिक मस्तिष्क क्रिया लुप्त हो गईं थी और इन सभी गायों को गोली मारकर समुद्र में फेंकागया था । हमारी खोज के अनुकूल बीजाहारी मनुष्य ने जब कच्चा मांसाहारी भोजन किया था तो मस्तिष्क में तत्व दुर्गुण पैदा हुआ था और शरीर को चलाने वाली ** मन की तरंग ** भयभीत होकर मस्तिष्क के अग्र भाग में बैठ गईं है जिससे मानव मस्तिष्क लगभग 90 %अधिक आक्सीजन लेता है । इससे मनुष्य की प्राकृतिक मस्तिष्क क्रिया लुप्त होकर भौतिक मस्तिष्क क्रिया का निर्माण हुआ है जिसमें जीवन जीने का प्रोग्राम नहीं है इसी को अज्ञानता कहते हैं और यह अज्ञानता ही असभ्यता की जननी है । इस असभ्य व्यक्तिके मरने पर इसकी आत्मा या रूह प्रकृति या खुदा- परमेश्वर में विलय नहीं हुई वल्कि उसकी प्रेत योनि हुई थी और यह प्रेतआत्माएं आत्मबल हीन् आदमी को पकड़ लेती थी जिससे मनुष्य आवश्यकता से अधिक उत्तेजित होकर पागल जैसे हो जाता था और जिस व्यक्ति की यह प्रेत-आत्मा होती थी वह अपनी जीवन कहानी अपने द्वारा प्रभावित किए व्यक्ति से कहती थी इसी को लोग पुनर्जन्म समझते हैं । उस समय यह प्रेत आक्रमण मनुष्य जीवन पर सबसे बड़ी विपत्ति थी जैसे आज करोना वायरस महामारी क्योंकि इससे पूर्व ऐसा कभी नहीं हुआ था इससे पूरी मानवता भयभीत हो गईं थी ।
इसी विपत्ति से मनुष्य जीवन को बचाने के लिए पुर्तगाल देश से ** यूरेशियन नस्ल ** के लोगों ने मांसाहारी भोजन से दूषित भौतिक मस्तिष्क को ही अपना प्राकृतिक मस्तिष्क समझकर सर्व प्रथम पारसी सभ्यता की खोज की थी जिसे आज पारसी धर्म कहते हैं । जिसमें अग्नि पूजा सर्वोपरी है । क्योंकि अग्नि के पास रहने वाले व्यक्ति को प्रेत-आत्मानहीं पकड़ती थी । अपनी दूषित हुई भौतिक मस्तिष्क क्रिया को सात्विक बनाने के लिए इन्होंने दूसरे व्यक्ति की बनाई जीवन नीति मस्तिष्क में रिकॉर्ड कराने की विधि विकसित की गईं जिसे आज ** शिक्षा ** कहते हैं । इसलिए पारसी धर्म में अर्थउपार्जन , अग्नि पूजा, शिक्षा , एवं साफ सफाई को सर्वश्रेष्ठ माना गया । इनके इस धर्म में प्रभावकारी व्यक्तियों की मृत्यु के बाद उसकी प्रेत – आत्मा को शक्ति या भगवान मानकर उसकी अनेकों प्रकार से पूजा की जाती है । पारसी सभ्यता के भोजन करने में कोई आचार्यसन्हिता नहीं थी ये लोग पूर्ण रूप से मांसाहारी भोजन करते थे इसलिए इनकी सभ्यता में ** मोक्ष ** का कोई स्थान नहीं है और यह सभ्यता धर्म की परिभाषा में नहीं आता है वल्कि प्रेत-आत्मा से बचने के लिए मनगढंत नियम बनाकर जीवन व्यतीत करना है ** जिस सभ्यता कहते हैं ** यह सभ्यता या नियम सभी व्यक्ति का अपना-अपना भी हो सकता है । उस समय इस सभ्यता को सभी यूरेशियन नस्ल के गोरे लोगों ने अपनाना प्रारम्भ किया, इस सभ्यता के कारण अन्धविश्वासी ये गोरे नस्ल के लोग अपने को ही मनुष्य मानते हैं अन्य सभी नस्ल के लोगों को जानवर समझकर उसे नष्ट कर देना चहाते हैं । इनकी नस्ल में आज भी भेद की नीति है जो समय-समय पर दिखाई देती है ।
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( सन्त हरिनन्द सरस्वती 9811074545 )