प्राकृतिक दर्पण में राजनीति

प्रश्न: मनुष्य जुर्म क्यों करता है, क्या शान्ति भंग हो जाने से करता है या सुरक्षा व्यवस्था कमजोर पड जाने से, इस प्रश्न का उत्तर होना अति आवश्यक है। इसका उत्तर आज के प्रवेश में इस प्रकार है: 

उत्तर- आज दुनिया के राजनैतिक व्यवस्था के संविधान में जो मनुष्य जुर्म करता है वह सुरक्षा व्यवस्था कमजोर पड़ जाने से करता है। समाज का एसा सोच ही गलत है इसलिए कि अगर यह मान लिया जाए कि मनुष्य सुरक्षा व्यवस्था कमजोर पड़ जाने से कोई जुर्म करता है तो किसी दोसी व्यक्ति को प्रशासन उस समय गिरफ्तार करता है, जब वह अपराधी बन गया होता है।

क्या दुनिया में ऐसे संविधान नहीं है जो मनुष्य की मानसिकता में शान्ति बनाये रखें। जिससे पूरी मानवजाती कोई भी जुर्म न कर सके। इस ईश्वर रूपी शरीर को कठिन से कठिन सजा से अज्ञानी मानव समाज को बचाया जा सकें। जो व्यक्ति अपने संविधान की धारा से अपराधी को सजा देते हैं वे अपने विधान में शांन्ति बनाए रखने का क्या विधान बनाया है। ऐसा विधान होता तो तुच्छ मन का ही मृत्यु होता शरीर तो इसका भुक्त भोगी नहीं होता। जैसे सारे धर्मों में है जो जीवन जीने का संविधान है। कि मनुष्य अपना प्रकृति में पूर्ण जीवन कैसे जिए।

जीवन जीने का संविधान पर आज के दुनिया के राजनैतिक व्यवस्था के संविधान में इसके विपरीत है, मानव को मनो शान्ति से जीयन न देकर सजा मिलती है। यह कहाँ तक उचित है। पर जीवन जीने की कला से तो अपराधी को भी विद्वान बनाया जा सकता है। इतिहास इसका साक्षी है जैसे बाल्मीकी व अंगुली माल डाकू । ऐसे अनेक को दानव से देवता बनाया गया जिससे ऐसे तुच्छ मानसिकता का परिवर्तन हुआ वह भी एक जीवन जीने का विधान ही था। क्या आज इस पृथ्वी पर मनुष्य का सोच ही तो नहीं मर गया है। अगर मरा नहीं होता तो ऐसे लिखित विधान, मानव दुनिया में नहीं बनाता। जिस संविधान से मानसिक परिवर्तन नहीं हो सकता वह जीवन जीने का विधान क्या बतायेगा। अगर जीवन जीने की कला, मनुष्य में आ जाये तो उसके प्रकोप से कुछ समय में ही पुरी दुनिया में शान्ति स्थापित हो जाए। 

सारे अपराधों पर काबू पाया जाय। यह पृथ्वी हम मनुष्य के बुरे कर्मो से खाली हो जाए। जहाँ पर हमे आज सजा मिलती है। वहीं परिवर्तन होने पर हमे नया जीवन मिलेगा। बीमारी रहित जीवन इन्द्रियों का सदुपयोग, लम्बी-आयु यही हमारे जीवन जीने का पूर्ण अर्थ होगा। 

जो हमारे सारे धर्मो के प्रवर्तक थे, वे इसी सत्य मानसिकता के पुजारी थे जिन्हें हम अमर कहते हैं। आज जरूरत है, ऐसे मानसिक परिवर्तन की जो इस अज्ञानता के अंधेरे में एक झान रूपी सूरज उमे, और हम मानव जाति को प्रकाश दें हमारी तलाशों का उदय हो यहीं हमारा जीवन है। अज्ञानता के अन्धकार से ही हम एक दूसरे से जलते है। मारते है। गलत नशा की लत में आकर अनगिनत बुराईयों करते है बलात्कार जैसे बुरे कर्मों को अपना जवीन मान बैठते है इसका परिणाम होता है कि हमारी यह ईश्वर रूपी शरीर का छोटी आयु बीमारी भरा जीवन, इन्द्रियों का दुरूपयोग मरने के बाद भी आत्माओं का मटकना जारी रहता है। क्या यह उचित है इन सभी बुराईयों से निपटने का एक ही रास्ता है वह है ज्ञान गंगा महा कुम्भ में नहा कर छन्य होना। जिन्हें हम अपना आदर्श मानते हैं। वह इसी गया में नहाये हुए देवता है। जो कई हजारों वर्षों के बाद भी जीवित है और जब तक यह पृथ्वी रहेगी तब तक रहेंगे।

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