अपना पथ एक आध्यात्मिक समूह है जो ध्यान, सेवा और आत्मबोध के माध्यम से लोगों को आंतरिक शांति, प्रेम और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा और दिशा प्रदान करता है।
में संत विनोद दास समाज सुधार और सेवा अपना जीवन कार्य मानता हूँ धार्मिक सरकार में पलने के बाद आनियों की प्रेरणा से में विश्व शांति अभियान पर कार्य करने के लिए प्रेरित हूँ इस कार्य को करने के लिए हमें आत्म बल झुटाने में कई वर्ष लगे है साथ में विचारों को धार्मिक विषयों पर टिका कर आज हमें यह कार्य करने में सफलता मिली है मुझे आत्म आभ्यास से बुद्धि को विकसित करने के बाद मानव जीवन के अनेक अच्छे बुरे कार्यों पर चिन्तन विका इस विन्तन में हमें स्थिर रहना भी हमारे बस की चात नहीं छोड़ दिया है आज के मानव में करतूतों पर नज़र पड़ती है तो आखों से आसू के सिवाय हम कुछ नहीं कर पाते। इसलिए में अपने नवीनतम खोजों से मनुष्य जाति की बुद्धि में शाति कैसे फैलाई जाय यही हमारा विषय है इसी विषय को लेकर मैं आज पूरी दुनिया में यह अभियान कायम कर रहा हूँ। प्रकृतिवादी हूँ जो आनन्द हमें प्राप्त हुए है उसे वर्णन करना भी हम छोटा मानते है इसलिए कि शब्दों में आनन्द को लिखा नहीं जा सकता आनन्द के आभाव में ही पुरी दुनिया में उग्रवाद व असुरक्षा है यह सारे अधर्म है बुराई पर अच्छाई का विजय का नाम ही धर्म है आज सारे धर्मों के बहुत सारे लोग पूरी मानवता को ऐसे तोड दिये है कि विश्वास ही आद्यात बन गया है मानवता पूरी दुनिया में विखडी पड़ी है। मानवता को एकता में लाने के लिए ही धर्मों का निर्माण किया गया था आज सारे धर्मा का नाम रहते कई करोड़ो लोगों की हत्याएँ व असुरक्षा अपनी चरमसीमा पर है आज किस धर्म का निमाण किया जाय कहीं धर्म का सार शब्द ही तो इस दुनिया से गायब तो नहीं हो गया। अगर हुाभ नहीं होता तो विनाशक खोज विकास के नाम से नहीं जाना जाता। उग्रवाद धर्म की लड़ाई से नहीं देखा जाता बहुत सारे अपराधी सत्ता के अधिकारी नहीं होते वर्तमान में सत्ताधरी घोटाले को अपना विजय नहीं मानते क्या ऐसे विकास लडाई सत्ता विजय दुनिया में किसी भी धर्मो से मेल खते है इन सभी जटिल विषयों को देख कर मैं धर्मी पर गहन चिन्तन किया देखा कि आज हमारे दुनिया के लगभग आधी मानव जाति इस्लाम धर्म को स्वीकारती है इसमें जीना मरना अपना आदर्श का रूप है आइये इस धर्म है गहराई में चलें मानव जाति के आदर्श हजरत मोहम्मद शाहव इसकी नीव रखी थी निर्माण में वे मानव मस्तिष्क का खोज किया खोज के दौरान इसी समाज ने उन्हें अनेक दुख कष्ट बहुत समयों तक देता रहा कठिन परिस्थितियों के बाद भी अपना खोज जारी रखा खोज था मस्तिष्क में जुर्म का चिन्तन न हो इसी चिन्तन के दौरान उन्हें अनेक अमानवीक व्यवहारों के साथ जीना पड़ा समाज के बहुत सारे लोग उन्हें हीन मवानाओं से देखने लगे फिर भी इसपर ध्यान न देकर अपना खोज जारी रखा इधर उनके खिलाफ दिन प्रतिदिन उग्रवाद भी तगडा होता गया इन्हीं समयों के बची एक रात उन पर जानलेचा हमला हुआ और वे अपना पैत्रिक नगर मक्का छोड रातों रात मदीना के लिए जाना पड़ा मदीना भी जाकर अपने कार्य में जुटे रहें अंन्त में अपने खोज का वैज्ञानिक सूत्र निकाला प्रयोगशाला जो मस्जिद के नाम से जाना जाता है। विचारों में विकार न बने इस के लिए दिन में कई बाय नमाज का आहान यह उनके खोज का सूत्र रहा जुआ, सट्टा, शराब खोरी जिनकारी व्याज लेना यह सब करना महा हराम है इसी पर धर्म की नीव खड़ी की इसी सूत्र पर उन्होंने पूरी दुनिया में मुसलम ईमान लाने की भविष्यवाणी की थी जो उनके जमाने के समय के बाद भी सफल रहा यह सारी सफलता के बाद फिर अपनी तरफ देखें कि इतना बड़ा परिवर्तन कैसे संभव हुआ यह सब सारे संस्कारी बीज का परिणाम रहा जिसमें भों की भूमिका प्रथम है इसके बाद नारी जाति पर हो रहे अत्याचार पर उनका ध्यान गया उस जमाने में अंध विश्वास में कन्याओं को जिन्दा ही जमीन में गाड़ दिया जाता था। ऐसे क्रूर प्रथा, को वे जड़ से ही समाप्त करके ही सांस ली स्त्रियोका हक समाज में बरकरार बना रहे इसके लिए वे सख्त नियम बनाये इस नियम से खुश होकर सबसे पहले वहा की हजरतखदीजा नाम की महिला ही इस्लाम स्वीकार की जो इस्लाम धम्र के अनुयाईयों में सबसे पहला नाम उसी महिला का है मुस्लिम धर्म की महिलायें प्रायः काले बुरके पहनती है यह इस बात का द्योतक है कि उन पर बुरी नजर डालना हविश के नियमों के विरुद्ध है और पाप धार्मिक जगह पर जैसे मक्का में हज के दौरान बराबरी में नमाज अदा करना यह उनके धर्म की शोभ रही है जो धार्मिक व्यक्ति अपने पूरे जीवन भर उग्रवाद से ही लगता का उदही के चलते अपना पैविक नगर छोड़ दी फिर घृणा बस मक्का कभी हरने के लिए नहीं गये व व्यक्ति अपने बनाये हुए एक नीव में उग्रवाद जैसे पुमित रास्ते पर चलने के लिए इजाजत कैसे देगा प्रकृति वादी व्यक्ति प्रकृति में मरना तो स्वीकार कर सकता है पर दूसरों पर जुर्म करना या नुकसान करना तो दूर की बात सोचना भी जुर्म मानता है ईसा मसीह सूली पर चढ़ गये पर चढ़ाने वाले राजा और सिपाहियों के लिए ईश्वर से दुआ मागें। हे पिता इन्हें माफ करना यह नहीं जानते कि हम क्या कर रहें है यह कार्य करना पून्या धम आज के प्रकृति यादी तो नही रहे पर उनकी यह पवित्र भूमि हमारे हजारों पाप करने के बाद भी अपनी तरफ खींचती है कि मभित्रका में अच्छाई का बीज बोया जा सके यही उनको भूमि का सार है अलग अलग देशों में अलग अलग धर्मो का निर्माण हुआ उद हजार किलो मीटर अंतर भी रहा पर सबके सूत्र एक जैसे ही है जैसे कृष्ण ने गाय चराई, ईसा ने भेड मोहम्मद साहब ने बकरिया इनका प्रथम शाला भी एक जैसा ही है जैसे गोल गुबज (पिरामिडनुमा) जैसे मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर, गुरुद्वारा, अंतिम संस्कार भी सबका उत्तर दक्षिण का ही है सारे प्रयोगशाला अपनी उचाई पर त्रिशुल बल्ब तीन, चाँद तारे जूस इशारा करते है। कि ईश्वरी शक्ति उपर है और उत्तका आहन यहां होता है पर आज सारी दुनिया के लोग अपने अपने धर्मों की बात तो करते हैं पर विचार उनके धर्मा से अलग ही होता आया है पर हमारे प्रवर्तक ऐसे नहीं थे वे अपने और ईश्वर के बीच की दूरी को खत्म करको नेक जीवन जीने का अधिकारी रहे आज उनकी बातों को अंधविश्सवास मान कर समाज अपनी गलत सोब से अपना अंत करने पर उतारू है जैसे जबसे राजतंत्र के घोर कुकर्म से उब कर समाज राजनीति तंत्र की तरफ आया तब से भी आजतक दो बार विश्व युद्ध हुए जिसमें कई करोड़ों लोगों की हत्याएँ शामिल है हीरोशिमा जापान में लाखों लोगों की हत्याएँ विदेशों में रिवेटरों का फटना 1984 यूनियन कारवईड भोपाल काड 2001 में वर्ल्ड ट्रेड पर हमाला अफगानीसतन व ईराक में बम चारी ईजराईल फलैस्तीन का विवाद, जम्मू कश्मीर का 50 वर्षों से युद्ध विश्व युद्ध से लेकर आज तक ऐसे छोटे बड़े उन्नीस युद्ध हुए है विशैले तत्वों से नरसंहार आग रहा है। क्या यही आदमी का विकास है आज दुनिया में कहीं भी किसी तरह का प्राकृतिक आपदा आती है। तो जिसे निपटने के लिए सारी दुनिया एक साथ मिलकर जी जान से हर हालत में मुकाबला कर ही लेती है। यह स्वाभाविक है। पर मानव अपने क्रूरता से योजना वद तरीके से एक साथ हजारों लाखों लोगों की हत्या से निपटने के लिए हम किसकी गुहार लगाये इसी क्रूरता से आज अनेक जीवधारी पेड़ पौधों की जातियों लुप्त हो गयी और होती जा रही है। समाज कुछ भी विकास कहे अपने आप को पर आज का मनुष्य क्रीत्रीम रूप से ही जीवित है जीवन खाक हवाओं पर अगर भों के गर्भ से ही जीवन रक्षक दवाओं को बन्द कर दिया जाय तो परिणाम सामने आ जायेगा यह मानव जाति के लिए बहुत ही अशुभ संदेश है आज इस विकास से जीवन का स्वरूप हवा पानी, आकाश, मृदा ओजोन सब पर विनाशकी छाया दिखने लगा है एटम बम का तो मैं घोर विरोधी हूँ पर एड्स हेपेटाईटिस, केन्सर ला ईलाज, टी.वी. सुगर, दसा ब्लडप्रेशर, कुष्ठ, जिन बीमारियों का कोई इलाज ही नहीं इसके लिए किसका नाम रखें? पर होती तो मानव को ही है यह यही गत मानसिकता का परिणाम है जो शरीर को जर्जर बना दिया है जिसे हमारी जीवनी शक्ति का हास होने से सभी तरह की बीमारियों हम पर आक्रमण करती है कहीं मनुष्य जाति को बनाकर ईश्वर ने गलत तो नहीं किया यह भी एक प्रश्न है पर सबको देखकर वह कौन ऐसा मस्तिष्क का भाग है जो यह सब जुर्म करना कर भी अपना अत नहीं मानता इसका उत्तर में खोजने में कारगर रहा हूँ प्रश्न उठता है कि क्या इतना बड़ा परिवर्तन सभव है उदाहरण हमारे सूत्र का है। कि नौवेल को खोज से दुनिया मिटाई जा सकती है तो हामरे सूत्र से बसाई क्यों नहीं जा सकती। राईट बन्धुओं के खोज से बिना पंख का आदमी हवाई जहाज में बैद्रकर सुरक्षित दुनिया के हर कोने में जा सकता है। ऑटो के खोज से मोटर साईकिल कार अधिक से अधिक वजन लेकर कई सौ गुना रफ्तार से चल सकते हैं सिंगर के बनाये हुए सिलाई मशीन से दुनिया का हर व्यक्ति सिना सिलाया कपड़ा पहन सकता है। तो ऐसे ही हमारे खोज से सारी बुराईयों को कुछ वर्षों में क्यों नहीं मिटाया जा सकता। समाज को जीवन का सही रास्ता न दिखने से ही अंधकार में ही सारी बुराईयां करता है दुनिया के हर एक व्यक्ति को अपने जीवन की तलाश है जीवन है कहाँ इसका पता तो नहीं पर पता चल जाये तो पलभर में अपनाने के लिए तैयार है बशर्ते हमारा मस्तिष्क का खोज विज्ञान के कसौटी पर खरा उतरना चाहिए जो में सौ प्रतिशत उतारने के लिए तैयार हूँ यह खोज विज्ञान का है इसलिए इस खोज को अधुनिक विज्ञान की कसौटी पर उतार कर दुनिया के हर एक सविधान में न्यायपालिका जैसे जगह दी जाय जिससे समाज । को लिखीत संविधान द्वारा प्रसीक्ड दिलवाकर अपराधी बनते से रोका जाय अगर कोई अपराधी हो ही गया हो तो उसे किसी भी तरह का सजा न देकर सजा के बदले मस्तिष्क शोध से दानव से देवता बना कर जीवन दान दिया जा सके इसी के आभाव में दुनिया का हर एक संविधान समाज को सारे आधुनिक सुख सुविधायें उपलब्ध करा कर भी अपराधों पर काबू पाने में अपूरा साबित हो रहा है अपराधों से निपटने के लिए कठोर से कठोर कानून बनये जा रहे है। पर इसका असर समाज पर न होकर अपराध दिन प्रतिदिन अपना विकराल रूप लेता जा रहा है। दुनिया के सामने अपराध से निपटना एक चुनौति बन गया है। इस लिए की मस्तिष्क में बैठा अज्ञानता रूपी विष पलभर में किससे कितना बडा अपराध करा दें इसे किसी भी तरह से आंका नहीं जा सकता।
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